दंष्ट्र दंष्ट्र-संज्ञा पुं० दाँत | दंस -संज्ञा पुं० दे० "दंश" । दश्त-संज्ञा पुं० दे० " दैत्य" । दई - संज्ञा पुं० १. ईश्वर । २. दैव - संयोग । दईमारा- वि० [स्त्री० दर्शमारी ] श्रभागा । दकीका -संज्ञा पुं० १. कोई बारीक बात । २. युक्ति । दक्खिन -संज्ञा पुं० [वि० दक्खिनी ] वह दिशा जो सूर्य की श्रोर मुँह करके खड़े होने से दाहिने हाथ की ओर पड़ती है । दाक्खनी - वि० दक्खिन का | संज्ञा पुं० दक्षिण देश का निवासी । दक्ष - वि० निपुण | दक्षकन्या - संज्ञा स्त्री० सती, जो शिव की पत्नी थीं । 2 दक्षता - संज्ञा स्त्री निपुणता । दक्षिण - वि० दाहिना । संज्ञा पुं० उत्तर के सामने की दिशा । दक्षिणा - संज्ञा स्त्री० १. दक्षिण दिशा । २. वह दान जो किसी शुभ कार्य श्रादि के समय ब्राह्मणों को दिया जाय । ३. पुरस्कार । दक्षिणायन - वि० भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर । संज्ञा पुं० सूर्य की कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर गति । दक्षिणीय - वि० १. दक्षिण का । २. जो दक्षिणा का पात्र हो । दखल - संज्ञा पुं० १. अधिकार । २. हस्तक्षेप | ३. पहुच । दखिन - संज्ञा पुं० दे० "दक्षिण" । दखिना । - वि० दक्षिण का । दखल - वि० जिसका दखल दखल या कब्ज़ा हो । । ३५२ दचना दखलकार-संज्ञा पुं० वह भासामी जिसने किसी ज़मींदार के खेत या ज़मीन पर कम से कम बारह वर्ष तक अपना दखल रखा हो । दगड़ - संज्ञा पुं० लड़ाई में बजाया जानेवाला बड़ा ढोल । दगदगा-संज्ञा पुं० १. डर । २. संदेह | दगदगाना - क्रि० प्र० दमदमाना । क्रि० स० चमकाना | दगदगी - संज्ञा स्त्री० दे० " दगदगा" । दगधना- क्रि० प्र० जलना । क्रि० स० जलाना । दगना- क्रि० प्र० जलना । १. छूटना । २. क्रि० स० दे० " दागना " | दगवाना- क्रि० स० दागने का काम दूसरे से कराना | ०१. दगहा - वि० १. जिसमें दाग़ हो । २. दाह- कर्म करनेवाला । ३. जो दागा हुआ हो । दग़ा - संज्ञा स्त्री० छल-कपट । दगादार - वि० दे० " दगाबाज़" । दगाबाज़ - वि० धोखा देनेवाला । दगाबाज़ी - संज्ञा स्त्री० छल । दगैल - वि० दाग़दार | संज्ञा पुं० दगाबाज़ । दग्ध - वि० १. जला हुआ । दुःखित । २. दचकना - क्रि० प्र० [ संज्ञा दचका] १. ठोकर या धक्का खाना | २. दब जाना । क्रि० स० १. ठोकर या धक्का लगाना । २. दबाना | दचना- क्रि० भ० गिरना ।
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