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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/४१२

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त ४०४ नचाना नखक्षत - संज्ञा पुं० वह दाग़ या चिह्न जो नाखून म के गड़ने के कारण बना हो । नखछोलिया - संज्ञा पुं० दे० " नख- पत" । नखत, नखतर-संज्ञा पुं० दे० "नक्षत्र" । नखना- क्रि० प्र० डाँका जाना । क्रि० स० पार करना । क्रि० स० नष्ट करना । नखरा - संज्ञा पुं० चोचला । नखरा-तिल्ला - संज्ञा पुं० नखरा । नखरीला | - वि० नखरा करने वाला । नखरेखा - संज्ञा स्त्री० नखचत । नखरेबाज़ - वि० [ संज्ञा नखरेबाजी ] जो बहुत नखरा करे । । नखराट - संश स्त्री० दे० " नखक्षत" । नखशिख - सज्ञा पुं० १. नख से लेकर शिख तक के सब अंग । २. शरीर के सब अंगों का वर्णन । नखियाना* +- क्रि० स० नाखून गड़ाना । नखी - संज्ञा पुं० वह जानवर जो नाखून से किसी पदार्थ को चीर या फाई सकता हो । संज्ञा स्त्री० नख नामक गंधद्रव्य । नखोटना | क्रि० स० नाखून नाखून से खरोचना या नाचना | नग - संज्ञा पुं० १. पर्वत । २. सप । संज्ञा पुं० नगीना । नगज-संज्ञा पुं० हाथी । वि० जो पहाड़ से उत्पन्न हो । नगण्य - वि० तुच्छ । नगदंती - संज्ञा स्त्री० विभीषण की स्त्री । नगद - संज्ञा पुं० दे० "नकुद" । नगधर - संज्ञा पुं० श्रीकृष्णचंद्र | नगनंदिनी-संज्ञा स्त्री० पार्वती । नगनी - संज्ञा स्त्री० १. कन्या । नंगी स्त्री । । २. नगपति - संज्ञा पुं० हिमालय पर्वत । नगर - संज्ञा पुं० शहर । नगरकीर्त्तन - संज्ञा पुं० वह गाना, बजाना था कीर्तन, जो नगर की गलियों और सड़कों में घूम घूम- कर हो । नगरनारि-संज्ञा स्त्री० वेश्या । नगरपाल - संज्ञा पु० वह जिसका काम नगर की रक्षा करना हो । नगरवासी-संज्ञा पुं० नागरिक । नगरी - संज्ञा स्त्री० नगर | सज्ञा पुं० शहर में रहनेवाला । नगाड़ा-संज्ञा पुं० दे० "नगारा " । नगाधिप-संज्ञा पुं० हिमालय पर्वत । नगारा - संज्ञा पुं० नगाड़ा । नगारि-सञ्ज्ञा पुं० इंद्र | नगी - संज्ञा स्त्री० रख । नगीच | - क्रि० वि० दे० " नज़दीक ' । नगीना - संज्ञा पुं० रत्न । नगेंद्र, नगेश - संज्ञा पुं० हिमालय । नगेसरि | संज्ञा पुं० दे० "नागकेशर" । नग्न- वि० जिसके ऊपर किसी प्रकार का श्रावरण न हो । नग्नता - संज्ञा स्त्री० नंगे होने का भाव । नचना* +- कि० भ० नाचना । वि० १. नाचनेवाला । २. बराबर इधर-उधर घूमनेवाला । नवनि+ -संज्ञा श्री० नाच । नचनिया | - संज्ञा पुं० नाचनेवाला । नचनी - वि० जी० १. नाचनेवाली । २. इधर-उधर घूमती रहनेवाली । नचाना- क्रि० स० १. नृत्य कराना । २. हैरान करना ।