नारंग नारंग - संज्ञा पु० नारंगी । नारंगी - संज्ञा श्री० १. नीबू की जाति का एक मझोला पेड़ जिसमें मीठे, सुगंधित और रसीले फल लगते हैं । २. नारंगी के छिलके का सा रंग । वि० पीलापन लिए हुए लाल रंग का । नार-संज्ञा खो० १. गरदन । २. जुलाहों की ठरकी । २. बहुत + सज्ञा पुं० १. नाला । मोटा रस्सा । ३. नारा | + संज्ञा खो० दे० "नारी" । नारकी - वि० पापी । नारद - सज्ञा पुं० १. एक प्रसिद्ध देवर्षि । २. जो ब्रह्मा के पुत्र कहे जाते हैं झगड़ा करानेवाला आदमी । नारदीय - वि० नारद संबंधी । नारना - क्रि० स० थाह लगाना । नारसिंह - संज्ञा पुं० नरसिंह रूपधारी विष्णु | नारा -संज्ञा पुं० इज़ारबंद | नाराच - सज्ञा पुं० १. लोहे का बाण | २. दुर्दिन । नाराज्ञ-वि० [ संज्ञा नाराजगी, नाराजी ] अप्रसन्न । नारायण-संज्ञा पुं० विष्णु । नारायणीय - वि० नारायण संबंधी । नाराशंस - वि० जिसमें मनुष्यों की प्रशंसा हो । संज्ञा पुं० वेदों के वे मंत्र जिनमें राजाश्रों आदि की प्रशंसा होती है । नारि-संज्ञा स्त्री० दे० "नारी" । नारिकेल-सा पुं० नारियल । नारियल - संज्ञा पुं० १. खजूर की जाति का एक पेड़ । इसके बड़े गोल फलों के ऊपर एक बहुत कड़ा रेशेदार ४१५ नाखिका छिलका होता है जिसके नीचे कड़ी गुठली और सफेद गिरी होती है जो खाने में मीठी होती है । नारियल का हुक्का । २. नारियलो -संज्ञा खो० १. नारियल का खोपड़ा । २. नारियल का हुक्का । नारी-सज्ञा खो० श्रौरत ।
- संज्ञा स्त्री० दे० "नाड़ी" !
नारू - संज्ञा पुं० ढोल | नालंद - सज्ञा पुं० बौद्धों का एक प्राचीन क्षेत्र और विद्यापीठ जो मगध में पटने से तीस कोस दक्खिन था । नाल - संज्ञा स्त्री० १. डाँड़ी । २. नली । ३. सुनारों की फुकनी । ४. जुलाहें। की नली । ५. नारा जो पदा होने- वाले बच्चों को लगा रहता है । ६. नल बहने का स्थान । ७. कुंडला- कार गढ़ा हुआ पत्थर का भारी टुकड़ा जिसके बीचोबीच पकड़कर उठाने के लिये एक दस्ता रहता - ' इसे अभ्यास के लिये कसरत करने- वाले उठाते हैं नालकटाई - संज्ञा स्त्री० तुरंत के जनमे हुए बच्चे की नाभि में लगे हुए नाल को काटने का काम । नालकी संज्ञा स्त्री० इधर-उधर से खुली पालकी जिस पर एक मिह- राबदार छाजन होती है । नाला - सज्ञा पुं० [ स्त्री० प्रल्पा० नालो ] लकीर के रूप में दूर तक गया हुआ वह गड्ढा जिससे होकर बरसाती पानी किसी नदी आदि में जाता है । नालायक - वि० [ संज्ञा नालायकी ] अयोग्य । नालिका - संज्ञा खो० १. छोटी नाल