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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/४७०

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पवनाशन २. भीमसेन । पवनाशन- संज्ञा पुं० सौंप | पवनाशी - संज्ञा पुं० १. वह जो हवा खाकर रहता हो । २. साँप । पवनी + - संज्ञा बी० गाँवों में रहने- वाली वह छोटी प्रजा जो अपने निर्वाह के लिये गाँववालों से कुछ पाती है । पवर, पघरी | -संज्ञा स्त्री० दे० "पँवरि" । पवर्ग - संज्ञा पुं० वर्णमाला का पांचवीं वर्ग जिसमें प, फ, ब, भ, म, ये पाँच अक्षर हैं । पवार - संज्ञा पुं० दे० पवारना + - क्रि० स० " परमार" । फेंकना । स्त्री० १. एक पैर का जूता । २. चक्की का एक पाट । पवाई - संज्ञा पधाना- क्रि० स० खिलाना । पवि - संज्ञा पुं० १. वज्र । २. बिजली । । । पवित्र - वि० साफ | पवित्रता - संज्ञा स्त्री० सफाई | पवित्रात्मा - वि० पवित्र हो । जिसकी आारमा पवित्रित - वि० शुद्ध या निर्मल किया हुआ । पवित्री - संज्ञा स्त्री० कुश का बना छला जो कर्मकांड के समय श्रना- मिका में पहना जाता है । वशम - संज्ञा स्त्री० बढ़िया मुलायम ऊन जिससे दुशाले और पशमीने श्रादि बनते हैं । २. पशमीना - संज्ञा पुं० १. पशम । पशम का बना हुआ कपड़ा । पशु संज्ञा पुं० १. चार पैरों से चलने- वाला कोई जंतु जिसके शरीर का ४६२ पषा भार खड़े होने पर पैरों पर रहता । २. जीवमात्र । पशुता - संज्ञा स्त्री० १. जानवरपन | २. मूर्खता और औद्धत्य । पशुत्व-संज्ञा पुं० दे० "पशुता" । पशुधर्म-मंज्ञा पुं० पशुओंों का सा श्राचरण । पशुपतास्त्र - संज्ञा पुं० महादेव का शूलाख । पशुपति - संज्ञा पुं० १. शिव । २. श्रभि ३. श्रोषधि । पशुपाल - संज्ञा पुं० पशुओं को पालने- वाला । पशुराज - संज्ञा पुं० सिंह | पश्चात् - अव्य० पीछे । पश्चात्ताप - मंज्ञा पुं० अफ़सोस । पश्चिम - सज्ञा पुं० वह दिशा जिसमें सूर्य अस्त होता है । पश्चिमा संज्ञा स्त्री० पच्छिम दिशा । पश्चिमाचल-संज्ञा पुं० अस्ताचल । पश्चिमी - वि० १. पश्चिम की ओर का । २ पश्चिम-संबंधी । पश्चिमोत्तर - संज्ञा पुं० पश्चिम और उत्तर के बीच का कोना । पश्ता-संशा स्त्री० पश्चिमोत्तर भारत की एक श्रार्य भाषा जिसमें फ़ारसी आदि के बहुत से शब्द मिल गए हैं 1 पश्म-संज्ञा स्त्री० दे० " पशम" । पश्मीना - संज्ञा पुं० दे० " पशमीना" । पश्यतेाहर-संज्ञा पुं० वह जो आँखों के सामने से चीज़ चुरा ले I पष-संज्ञा पुं० १. पंख । २ तरफ । 5.971 पषा-संज्ञा पुं० दाढ़ी ।