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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/४७१

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पषान पषान-संज्ञा पुं० दे० " पाषाण" । पषारना+- क्रि० स० धोना । पसंघा | - संज्ञा पुं० पासंग | वि० बहुत ही थोड़ा या कम । पसंती:- संज्ञा स्त्री० दे० "पश्यंती" । पसंद - वि० जो अच्छा लगे । संज्ञा स्त्रो० अच्छा लगने की वृत्ति । पसनी | - संज्ञा श्री० [अन्नप्राशन नामक संस्कार । पसर - संज्ञा पुं० गहरी की हुई हथेली । + संज्ञा पुं० विस्तार । पसरना - क्र० अ० १. फैलना । विस्तृत होना । I २. । ३. पैर फैलाकर लेटना । पसरहट्टा-संज्ञा पुं० वह बाज़ार जिसमें पंसारियों आदि की दूकानें हैं। । पसराना- क्रि० स० दूसरे को पसा- रने में प्रवृत्त करना । पसली - संज्ञा खी० मनुष्यों और पशुओं आदि के शरीर में छाती पर के पंजर की घड़ी और गोलाकार हड्डियों में से कोई हड्डी । पसाउ + - संज्ञा पुं० प्रसाद । ४६३ पहनावा करने अथवा गरमी लगने पर शरीर से निकलने लगता है । पसुरी+- संज्ञा स्त्री० दे० "पसली" । पसूजना- क्रि० स० सीना । पसेउ + - संज्ञा पुं० दे० "पसेव" । पसेरी-संज्ञा स्त्री० पाँच सेर का बाट । पसेव - संज्ञा पुं० १. किसी चीज़ में से रसकर निकला हुना जल । २. पसीना । पसोपेश - संज्ञा पुं० १. श्रागा-पीछा । २. हानि-लाभ । पस्त - वि० १. हारा हुआ । २. थका हुश्रा । ३. दबा हुआ । पस्त हिम्मत- वि० भीरु । पस्सी बबूल - संज्ञा पुं० एक प्रकार का पहाड़ी बबूज़ | पहः - श्रन्य० १. निकट । २. से । पहँसुल - संज्ञा स्त्री० हँसिया के आकार का तरकारी काटने का एक औज़ार । पह+ - संज्ञा स्त्री० दे० "पौ”। पहचान - संज्ञा स्त्री० १. पहचानने की क्रिया या भाव। २. निशानी । ३. परिचय | पसाना - क्रि० स० भात में से माँड़ पहचानना - क्रि० स० चीन्हना । निकालना | + क्रि० भ० प्रसन्न होना । पसार-संज्ञा पुं० १. फैलाव । २. विस्तार | पसारना - क्रि० स० फैलाना । पसारी-संज्ञा पुं० दे० "पंसारी" । पसाव -संज्ञा पुं० माँड़ । पसावन -संज्ञा पुं० दे० "पसाव" । पसीजना - क्रि० श्र० १. रसना । २. दयाद्र होना । पसीना - संज्ञा पुं० वह जल जो परिश्रम पटना । - क्रि० स० पीछा करना । पहनना - क्रि० स० शरीर पर धारण करना । पहनवाना- क्रि० स० किसी और के द्वारा किसी को कुछ पहनाना । पहनाई - संज्ञा स्त्री० १. पहनने की क्रिया या भाव । २. पहनाने की मज़दूरी या उजरत । पहनाना - क्रि० स० दूसरे को कपड़े, श्रभूषण आदि धारण कराना । पहनावा - संज्ञा पुं० १. पोशाक । । २.