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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/४७९

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पापलोक पापलोक-संज्ञा पुं० नरक । पापहर- वि० पुं० पापनाशक । पापाचार - संज्ञा पुं० पाप का श्राच- रण । दुराचार | पापात्मा - वि० पाप में अनुरक्त । पापी । दुष्टात्मा । पापिष्ठ - वि० अतिशय पापी । बहुत बड़ा पापी । पापी - वि० १. पाप करनेवाला | अधी । पातकी । २. क्रूर । निर्दय । नृशंस । पर पीड़क | पापाश-संज्ञा श्री० जूता । पाबंद - वि० १. बँधा हुआ । बद्ध । स्वाधीन । कैद । २. किसी बात का नियमित रूप से अनुसरण करने- वाला । ३. नियम, प्रतिज्ञा, विधि, श्रादेश प्रादि का पालन करने के लिये विवश । पाबंदी - संज्ञा बी० पाबंद होने का भाव । पामर - वि० १. खल । दुष्ट । कमीना । २. पापी । श्रधम । ३. नीच कुल या वंश में उत्पन्न । पामाल - वि० १. पैर से मला या रौंदा हुआ। पद-दलित । २. तबाह । बरबाद | चौपट | । पाय + - संथा पुं० दे० "पाएँ" । पायँता - संज्ञा पुं० पलंग या चारपाई का वह भाग जिधर पैर रहता है । पैताना | पायँती - संज्ञा स्त्री० दे० "पायँता" । पायंदाज-संज्ञा पुं० पैर पोंछने का बिछावन । पाय* - संज्ञा पुं० पैर । पाँव | पाचक संज्ञा पुं० १. धावन । दूत । ૩૭૨ परिण 1 हरकारा । २. दास । सेवक | अनु- चर । ३. पैदल सिपाही । पायताबा- संज्ञा पुं० पैर का एक पह- नावा जिससे उँगलिये से लेकर पूरी या श्राधी टाँगें ढकी रहती हैं । मोज़ा । पायदार - वि० बहुत दिनों तक टिकने- वाला । टिकाऊ । दृढ़ । मज़बूत । पायल - संज्ञा स्त्री० नूपुर । पाज़ ब । पायस - संज्ञा स्त्री० खीर । पाया -संज्ञा पुं० १. पलंग, चौकी आदि में खड़े डंडे या खंभे के आकार का वह भाग जिसके सहारे उसका ढाँचा ऊपर ठहरा रहता है । गोड़ा। पावा । २. खंभा । स्तंभ । पायी - वि० पीनेवाला | पारंगत - वि० १. पार गया हुआ । २. पूर्ण पंडित । पूरा जानकार । पार - संश पुं० आमने-सामने के दोनों किनारों में उस किनारे से भिन्न किनारा जहाँ ( या जिसकी ओर ) अपनी स्थिति हो । दूसरी ओर का किनारा । पारई/- संथा श्री० दे० "परई" । पारख+ - संज्ञा श्री० १. दे० "पा- रिख" । २. दे० " परख" । ३. दे० " पारखी" । पारखी - संज्ञा पुं० १. वह जिसे परख या पहचान हो । २. परखनेवाला । परीक्षक | पारग- वि० १. पार जानेवाला । २. काम को पूरा करनेवाला । समर्थ । २. पूरा जानकार । पारण-संज्ञा पुं० किसी व्रत या उपवास के दूसरे दिन किया जाने वाला पहला भोजन और तत्संबंधी कृत्य ।