पाला हिंडोला । पिंगूरा । गहवारा । पाला - संज्ञा पुं० हवा में मिली हुई माप के अत्यंत सूक्ष्म अणुओं की तह जो पृथ्वी के बहुत टंढे हो जाने पर उस पर सफेद सफेद जम जाती है । हिम । पालागन - संज्ञा स्त्री० प्रणाम । दंड- वत् । नमस्कार । पालित - वि० पाला हुआ । रक्षित । पाली-संज्ञा श्री० एक प्राचीन भाषा जिसमें बौद्धों के धर्मग्रंथ लिखे हुए हैं और जिसका पठन-पाठन स्याम, बरमा, सिंहल आदि देशों में उसी प्रकार होता है जिस प्रकार भारत- वर्ष में संस्कृत का | पालू - वि० पालतू | पावँ - संज्ञा पुं० वह श्रंग जिससे चलते हैं। पैर । पावड़ा - संज्ञा पुं० वह कपड़ा या बिछौना जो श्रादर के लिये किसी के मार्ग में बिछाया जाता है । पायं- दाज़ | पाव-संज्ञा पुं० १. चौथाई । चतुर्थ भाग । २. एक सेर का बधाई भाग । चार छीक का मान । पायक - संज्ञा पुं० श्रनि । श्राग । पावदान -संज्ञा पुं० पैर रखने के लिये बना हुआ स्थान या वस्तु । पावन - वि० १. पवित्र करनेवाला । २. पवित्र । शुद्ध । पाक | संज्ञा पुं० १. श्रभि । २. प्रायश्चित्त । शुद्धि । ३. जन । ४. गोवर । ५. रुद्राच । ६. व्यास का एक नाम । ७. विष्णु । पावनता-संज्ञा स्त्री० पवित्रता । B8 पावंड पावना-संज्ञा पुं० १. दूसरे से रुपया श्रादि पाने का हक | लहना । २. वह रुपया जो दूसरे से पाना हो । पावसा -संज्ञा श्री० वर्षा काल । बर- सात । "पाया" पावा | -संज्ञा पुं० दे० " पाया" । संज्ञा पुं० गोरखपुर जिले का एक प्राचीन गाँव जो वैशाली से पश्चिम है। पाश - संज्ञा पुं० १. रस्सी, तार आदि से सरकनेवाली गांठों आदि के द्वारा बनाया हुआ घेरा जिसके बीच में पड़ने से जीव बँध जाता है और कभी कभी बंधन के अधिक कसकर बैठ जाने से मर भी जाता है २. पशु-पक्षियों को फँसाने का जाल या फंदा । ३. बंधन | फँसानेवाली वस्तु । पाशक- संज्ञा पुं० पासा । चौपड़ । पाशा - संज्ञा पुं० तुर्की सरदारों की उपाधि । फंदा । फाँस । -- i पाशुपत संज्ञा पुं० १. पशुपति या शिव का उपासक । २. शिव का कहा हुआ तंत्रशास्त्र । ३. प्रथर्ष वेद का एक उपनिषद् | पाशुपत दर्शन -संज्ञा पुं० एक सप्रि- दायिक दर्शन जिसका उल्लेख सर्व- दर्शन - संग्रह में है । नकुलीश पाशु- पत दर्शन । पाशुपतास्त्र - संज्ञा पुं० शिव का शूलास्त्र जो बड़ा प्रचंड था । पाश्चात्य - वि० १. पीछे का पिछला । २. पश्चिम दिशा का । पाखंड - संज्ञा पुं० १. वेदविरुद्ध श्रा- धरण करनेवाला | झूठा मत मानने- वाला । २. लोगों को ठगने के लिये साधुओं का सा रूप-रंग बनाने-
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