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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/५१६

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प्रोषितपतिका (नायिका) वह नायक जो विदेश में अपनी पत्नी के वियोग से विकल हो । विरही नायक । ५०८ प्रोषितपतिका ( नायिका ) -संज्ञा स्त्री० ( वह नायिका) जो अपने पति के परदेस में होने के कारण दुखी हो । प्रौढ़-वि० प्रौढ़ - वि० १. अच्छी तरह बढ़ा हुआ । २. जिसकी युवावस्था समाप्ति पर हो । ३. दृढ़ । प्रौढ़ता-संज्ञा स्त्री० प्रौढ़ होने का भाव । प्रौढत्व प्रौढ़ा -संज्ञा श्री० अधिक वयसवाली स्त्री । I फगुहारा लक्ष-संज्ञा पुं० पाकर वृक्ष । पिलखा । प्लवंग-संज्ञा पुं० १. वानर बंदर | हिरन । २. मृग । प्लवन - संज्ञा पुं० १ उछलना । २. तैरना | प्लावन -संज्ञा पुं० बाढ़ । प्लावित - वि० जो जल में डूब गया हो । प्लीहा - संज्ञा स्त्री० दे० "तिल्ली" । प्लुत - संज्ञा पुं० १. टेढ़ी चाल । उछाल । २. स्वर का एक भेद जो दीर्घ से भी बड़ा और तीन मात्राओं का होता है । फ - हिंदी वर्णमाला में बाईसव व्यंजन | इसके उच्चारण का स्थान श्रोष्ठ है । फंका - संज्ञा पुं० उतनी मात्रा जितनी एक बार फाँकी जा सके । फंकी - संज्ञा स्त्री० १. फाँकने की दवा । २. उतनी दवा जितनी एक बार में फाँकी जाय । फंग-संज्ञा पुं० बंधन । फंदा । फंद-संज्ञा पुं० १. बंधन । २. फंदा । जाल । ३. छल । धोखा । फँदनाः- क्रि० प्र० फंदे में पड़ना । फँसना | फदवार - वि० फंदा लगानेवाला । फंदा -संज्ञा पुं० रस्सी, तागे आदि का वह घेरा जो किसी को फँसाने के लिये बनाया गया हो । फनी । फाँद । फ फँसना - क्रि० स० १. बंधन या फंदे में पड़ना । २. अटकना । उलझना । फँसाना - १. फंदे में डालना । २. वशीभूत करना । फक - वि० बदरंग । फकीर - संज्ञा पुं० १. भीख माँगने- वाला । भिखमंगा । भिक्षुक । २. साधु । संसारत्यागी । ३. निर्धन मनुष्य । फकीरी - संज्ञा स्त्री० १. भिखमंगापन । २. साधुता । ३. निर्धनता । फगुआ - संज्ञा पुं० १. होली । होलि- कोत्सव का दिन | २. फागुन के महीने में लोगों का आमोद-प्रमोद । फाग । फगुहारा - संज्ञा पुं० वह जो फाग खेलने के लिये होली में किसी के यहाँ जाय ।