बँधनि वचन आदि से बद्ध होना । ५. प्रेम- पाश में बद्ध या मुग्ध होना । संज्ञा पुं० वह वस्तु जिससे किसी चीज़ को बाँधें । बँध नि+ - संज्ञा स्त्री० १ बंधन | जिसमें कोई चीज़ बँधी हुई हो । २. उल काने या फँसानेवाली चीज़ । बँधवाना- क्रि० स० बांधने का काम दूसरे से कराना | बंधान-संज्ञा पुं० १. लेन देन या व्यवहार आदि की नियत परिराटी । २. पानी रोकने का घुस । बाँध । ३. ताब का सम । ( संगीत ) बँधाना - क्रि० स० १. धारणा कराना । २. दे० " बँधवाना" । बंधु- संज्ञा पुं० १. भाई । २. सहायक । ३. मित्र । ४. एक वणवृत्त । ५. बंधूकपुष्प | बँधुश्रा - संज्ञा पुं० कैदी | बंदी | बंधुक - संज्ञा पुं० दुपहरिया का फूल । बधुता - संज्ञा स्त्री० दे० "बंधुस्व" । बंधुत्व - संज्ञा पुं० १. बंधु होने का भाव बंधुता । २. भाई-चारा । ३. मित्रता । बंधूक- संज्ञा पुं० दे० " बंधुक" । बंधेज -संज्ञा पुं० १. नियत समय पर दिया जानेवाला पदार्थ या द्रव्य । २. किसी वस्तु को रोकने या बाँधने की क्रिया या युक्ति । ३. रुकावट । प्रतिबंध | बंध्या - वि० स्त्री० ( वह स्त्री ) जो संतान न पैदा कर सके । बाँझ । बंध्यापन -संज्ञा पुं० दे० "पन" । बंध्यापुत्र - संज्ञा पुं० ठीक वैसा ही संभव भाव या पदार्थ जैसे बंध्या का पुत्र । कभी न होनेवाली चीज़ । ५२१ बकता बंपुलिस -संज्ञा स्त्री० मलत्याग के लिये म्यूनिसिपैलिटी आदि का बनवाया हुआ सार्वजनिक स्थान । बंत्र -संज्ञा स्त्री० युद्धारंभ में वीरों का उत्साहवर्द्धक नाद । रणनाद | हल्ला । बंबा - संज्ञा पुं० १. पानी की कल । पंप । २. सीता । बंबाना - क्रि० अ० गौ आदि पशुओं का ब ब शब्द करना । रँभाना । बंबू -संज्ञा पुं० डू पीने की बाँस की छोटी पतली नली । बस - संज्ञा पुं० दे० " वंश" । बंसलोचन - पंज्ञा पुं० बस का सार भाग जो सफेद रंग के छोटे टुकड़ों के रूप में पाया जाता है । अंसकपूर । वंसी - संज्ञा स्त्री० १. बस की नली का बना हुआ एक प्रकार का बाजा । बाँसुरी । २. मछली फँसाने का एक औजार । बंसीधर - संज्ञा पुं० श्रीकृष्ण | बँहगी -संज्ञा खो० भार ढोने का वह उपकरण जिसमें एक लंबे बाँस के दोनों सिरों पर रस्सियों के बड़े बड़े छींके लटका दिए जाते हैं । बउर + - संज्ञा पुं० दे० "बौर" या "मैौर" । बउरा - वि० दे० "बावला" । बक- संज्ञा पुं० १. बगला । २. अग- हत्य नामक पुष्प का वृत । संज्ञा स्त्री० प्रलाप | बकवाद । बकतर-संज्ञा पुं० एक प्रकार की जिरह या कवच जिसे योद्धा लड़ाई में पहनते हैं । साह | बकता - वि० दे० "वक्त" ।
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