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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/५७१

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बेहूदा बेहूदा - वि० [ संज्ञा बेहूदगी ] १. जो शिष्टता या सभ्यता न जानता हो । २. अशिष्टतापूर्ण । बेहूदापन - संज्ञा पुं० असभ्यता | बेहोश -वि० मूच्छित । बेहोशी-संज्ञा स्त्री० मूर्च्छा । श्रचेत- नता । बैंगन - संज्ञा पुं० एक वार्षिक पौधा जिसके फल की तरकारी बनाई जाती है। भंटा । बैंगनी, बैंजनी - वि० जो ललाई लिए नीले रंग का हो | बैकुंठ - संज्ञा पुं० दे० "वैकुंठ" । बैजनाथ - संज्ञा पुं० दे० " वैद्यनाथ" । बैठक - संज्ञा स्त्री० १. बैठने का स्थान । २. चैपाल । ३. बैठने का श्रासन | ४. अधिवेशन ५. संग । बैठका -संज्ञा पुं० वह कमरा जहाँ लोग बैठते हों । बैठकी-संज्ञा स्त्री० बार बार बैठने और ५६३ उठने की कसरत | बैठन - संज्ञा स्त्री० बैठक | बैठना- क्रि० प्र० १. स्थित होना । २. पचक जाना । ३. बिगड़ना । ४. जगना । ५. बेरोज़गार रहना । बैठवाना- क्रि० स० बैठाने का काम दूसरे से कराना | • बैठाना - क्रि० स० १ स्थित करना । २. वियत करना | ३. बिगाड़ना । बैठारना | * - क्रि० स० दे० "बैठाना" । बैढ़ना | - क्रि० स० बंद करना । बैत - संज्ञा बी० पथ । बैतरनी - संज्ञा खो० दे० "वैतरणी" । बैताल - संज्ञा पुं० दे० "वेताल" । बसवारा बैद - प्रशा पुं० [स्त्री० बैदिन ] वैद्य । बैदगी + - संज्ञा स्त्री० वैद्य का काम | बैदेही - संज्ञा स्त्री० दे० " वैदेही" । बैन - संज्ञा पुं० वचन । बैना - संज्ञा पुं० वह मिठाई आदि जो विवाहादि में इष्ट मित्रों के यहाँ भेजी जाती है । वैवार-संज्ञा पुं० व्यवसाय |

  • क्रि० स० बोना ।

बैपारी - संज्ञा पुं० रोज़गारी । बैयर | - संज्ञा स्त्री० औरत । बैया -संज्ञा पुं० बै 1 बैर-संज्ञा पुं० शत्रता । | 1 संज्ञा पुं० बेर का फल । बैरख -संज्ञा पुं० सेना का झंडा । ध्वजा । वैराग - संज्ञा पुं० दे० " वैराग्य" । बैरागी - संज्ञा पु० [स्त्री० वैरागिन] वैष्णव मत के साधुओं का एक भेद । बैराना । क्रि० अ० वायु के प्रकोप से बिगड़ना । - बैरी - वि० [ खो० बैरिन ] शत्र । बैल -संज्ञा पुं० [ खी० गाय ] १. एक चौपाया जिसकी मादा को गाय कहते हैं । २. मूर्ख । बैसंदर - संज्ञा पुं० अग्नि । बैस - संज्ञा स्त्री० १. श्रयु । २. यौवन । संज्ञा पुं० क्षत्रियों की एक प्रसिद्ध शाखा । बैसना - क्रि० स० बैठना । बैसर - संज्ञा खो० जुलाहों का एक औज़ार जिससे वे कपड़ा बुनते समय बाने को बैठाते हैं । बैसवारा - संज्ञा पुं० [ वि० बैसवारी ] अवध का पश्चिमी प्रांत ।