सुमगा भुनगा - संज्ञा पुं० [ श्री० भुनगी ] एक छोटा उड़नेवाला कीड़ा । भुनना- क्रि० प्र० भूनने का अकर्मक रूप । भूना जाना । भुनभुनाना- क्रि० प्र० भुन भुन शब्द करना । भुनाना - क्रि० स० बड़े सिक्के आदि को छोटे सिक्कों आदि से बदलना । भुरकना - कि० भ० सूखकर भुरभुरा हो जाना । बुरकना । क्रि० स० भुरभुराना ! भुरकुस - संज्ञा पुं० चूर्ण | भुरता संज्ञा पुं० १. दबकर विकृता- वस्था को प्राप्त पदार्थ । २. चोखा या भरता नाम का सालन । भुरभुरा - वि० [स्त्री० भुरभुरी ] जिसके कया थोड़ा प्राघात लगने पर भी अलग हो जायँ । बलुना । भुलक्कड़ - वि० जो बराबर भूल जाता हो । जिसका स्वभाव भूखने का हो । भुलवाना - क्रि० स० १ भूलना का प्रेरणार्थक रूप। २. भ्रम में डालना । भुलाना - क्रि० स० १. भूलने का प्रेर- गार्थक रूप । २. भूलना ।
- + क्रि० भ० १. भ्रम में पड़ना ।
२. भटकना । सुळावा - संज्ञा पुं० धोखा | भुवंग-संज्ञा पुं० सपि । भुवंगम - संज्ञा पुं० सपि । सुच:- संज्ञा पुं० वह आकाश या लोक जो भूमि और सूखे के अंतर्गत है । शुव-संज्ञा स्त्री० पृथ्वी ।
- संज्ञा स्त्री० भौंह । भ्र ।
भुवन-संज्ञा पुं० १. जगत् । २. लोक । पुराणानुसार लोक चौदह है। भुवनपति - संज्ञा पुं० भूपति । राजा । । ५८० भूगोल भुवा-संज्ञा पुं० घूया । रूई । भुवाल संज्ञा पुं० राजा । भुवि - संज्ञा स्त्री० भूमि । पृथिवी । भुशुडी-संज्ञा पुं० दे० " काकभुशुंडी"। भुस - संज्ञा पुं० भूसा । भुली:- भूँकना - क्रि० प्र० भूकना - क्रि० प्र० भू भू या भौं भौं शब्द करना ( कुत्तों को) । ( कुत्तों की बोली )
- - संज्ञा खी० भूसी ।
भूचाल - संज्ञा पुं० दे० "भूकंप” । भूजना + - क्रि० स० १. दे० " भूनना" । २. दुःख देना । भूँजा | । -संज्ञा पुं० भूना हुआा । चबेना । भूडोल - संज्ञा पुं० दे० " भूकंप" । भू-संज्ञा स्त्री० १. पृथ्वी । २. स्थान । भूकंप - संज्ञा पुं० पृथ्वी के ऊपरी भाग का सहसा कुछ प्राकृतिक कारणों से हिल उठना । भूख - संज्ञा स्त्री० १. खाने की इच्छा । २. सुधा । भूखना# 1- क्रि० स० सजाना । भूखा - वि० पुं० [स्त्री० भूखी] १. जिसे भूख लगी हो । २. ग़रीब, दरिद्र । भूगर्भ-संज्ञा पुं० पृथ्वी का भीतरी भाग । भूगर्भशास्त्र - संज्ञा पुं० वह शास्त्र जिसके द्वारा इस बात का ज्ञान होता है कि पृथ्वी का ऊपरी और भीतरी भाग किन-किन तत्वों का बना है और उसका वर्तमान रूप किन कारणों से हुआ 1 भूगोल - संज्ञा पुं० १. पृथ्वी । २. वह शास्त्र जिसके द्वारा पृथ्वी के ऊपरी स्वरूप और उसके प्राकृतिक विभागों आदि का ज्ञान होता है ।