मूर्षा भिषिक्त ] सिर पर अभिषेक या अन- सिंचन | मूर्वा-संज्ञा श्री० मरोड़फली । मूल-संज्ञा पुं० १. पेड़ों का वह भाग जो पृथ्वी के नीचे रहता है । पूँजी । - २. मूलक संज्ञा पुं० १. मूली । २. मूल स्वरूप | मलद्रव्य-संज्ञा पुं० आदिम द्रष्य या भूत जिससे और द्रव्य बने हों । मूल धन-संज्ञा पुं० वह असल धन जो किसी व्यापार में लगाया जाय । पूँजी । मूलपुरुष - संज्ञा पुं० किसी वंश का श्रादि- पुरुष जिससे वंश चला हो । मूलस्थली -संज्ञा स्त्री० थाला | बाल- वाल । । मलस्थान -संज्ञा पुं० बाप-दादा की जगह । मलाधार -संज्ञा पुं० मानव शरीर के भीतर के छः चक्रों में से एक चक्र । (योग) मूली-संज्ञा बी० एक पौधा जिसकी जड़ मीठी, चरपरी और तीक्ष्ण होती और खाई जाती है । मूल्य-संज्ञा पुं० किसी वस्तु के बदले में मिलनेवाला धन कीमत । मूल्यवान् - वि० जिसका दाम अधिक हो। कीमती । मूष, मूषक - संज्ञा पुं० चूहा । मूस -संज्ञा पुं० चूहा । मूसदानी -संज्ञा स्त्री० चूहा फँसाने का पिंजड़ा। मसना- क्रि० स० चुराकर ले जाना । मंसर, मूसल - संज्ञा पुं० १. धान कूटने का लंबा मोटा डंडा । ४० २. ६२५ मृगलोचना एक अस्त्र जिसे बलराम धारण करते थे । मूसलधार - क्रि० वि० मूसल के समान मोटी धार से । ( वृष्टि ) मूसला -संज्ञा पुं० मोटी और सीधी जड़ जिसमें इधर-उधर सूत या शा- खाएँ न फूटी हो । मसली - संज्ञा स्त्री० एक पौधा जिसकी जड़ औषध के काम में आती है । मूसा -संज्ञा पुं० १. चूहा । २. यहूदियों के एक पैगंबर जिनको खुदा का नूर दिखाई पड़ा था । मृग-संज्ञा पुं० [स्त्री० मृगी ] १. पशु- मात्र, विशेषतः वन्य पशु । २. हिरन । मृगचर्म -संज्ञा पुं० हिरन का चमड़ा जो पवित्र माना जाता है । मृगछाला - संज्ञा स्त्री० दे० " मृगचर्म" । मृगजल -संज्ञा पुं० मृगतृष्या की लहर । मृगतृषा, मृगतृष्णा-संज्ञा स्त्री० जल की लहरों की वह मिथ्या प्रतीति जो कभी कभी ऊसर मैदानों में कड़ा धूप पड़ने के समय होती है । मृगदाव-संज्ञा पुं० काशी के पास 'सारनाथ' नामक स्थान का प्राचीन नाम । मृगनाथ - संज्ञा पुं० सिंह । मृगनाभि संज्ञा पुं० कस्तूरी । मृगनैनी-संज्ञा स्त्री० दे० " मृगलोचनी" | मृगमद-संज्ञा पुं० कस्तूरी । मृगमरीचिका - संज्ञा स्त्री० मृगतृष्णा । मृगया - संज्ञा पुं० शिकार । श्राखेट । मृारोचन -संज्ञा पुं० कस्तूरी । मृगलोचना-वि० श्री० हरिय समान सुंदर नेत्रोंवाली (स्त्री) ।
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