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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/६३७

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मैमत स्य का पुत्र माना जाता है । मैमंत - वि० मदोन्मच । मैया - संज्ञा स्त्री० माता । माँ । मैर | संज्ञा खी० साँप के विष की लहर । मैल - सशा स्त्री० गर्द, धूल आदि जिसके पढ़ने या जमने से किसी वस्तु की चमक-दमक नष्ट हो जाती है । मैलखोरा - वि० ( रंग आदि ) जिस पर जमी हुई मैल जल्दी दिखाई न दे । मैला - वि० १. मखिन। स्वच्छ । २. विकार-युक्त । संज्ञा पुं० गलीज़ | मैला-कुचैला - वि० जो बहुत मैले कपड़े पहने हुए हो । मैलापन -संज्ञा पुं० मलिनता । मों* +- अव्य० दे० "मैं" । मोछ- संज्ञा स्त्री० दे० "मूँछ" । मोंढा - संज्ञा पुं० बस आदि का बना हुआ एक प्रकार का ऊँचा गोला- कार श्रासन | मोक्ष - सर्व० १. मेरा । २. अवधी और व्रजभाषा में "मैं" का वह रूप जो उसे कर्त्ता कारक के अतिरिक्त और किसी कारक-चिह्न लगने के पहले प्राप्त होता है । मोक्ष -संज्ञा पुं० १. बंधन से छूट जाना । २. शास्त्रों के अनुसार जीव का जन्म और मरण के बंधन से छूट जाना । मोक्षद- संज्ञा पुं० मोक्ष देनेवाला । मोखा - संज्ञा पुं० बहुत छोटी खिड़की । मरोखा | मोगरा -संज्ञा पुं० एक प्रकार का ६२६ मोड़ बढ़िया बड़ा बेला । ( पुरुष ) मोगल-संज्ञा पुं० दे० " मुग़ल " । मोघ - वि० निष्फल | चूकनेवाला । मोच-संज्ञा स्त्री० शरीर के किसी अंग के जोड़ की नस का अपने स्थान से इधर-उधर खिसक जाना । मोचन - संज्ञा पुं० बंधन आदि से छुड़ाना | मोचना- क्रि० स० १. छोड़ना । २. छुड़ाना । मोची - संज्ञा पुं० वह जो जूते आदि बनाने का व्यवसाय करता हो । वि० [स्त्री० मोचिनो ] छुड़ानेवाला । मोछ-संज्ञा स्त्री० दे० "मूँ छ" । मोज़ा -संज्ञा पुं० पैरों में पहनने का एक प्रकार का बुना हुआ कपड़ा । मोट- संज्ञा स्त्री० गठरी । मोटरी । संज्ञा पुं० चमड़े का बड़ा थैला जिससे खेत सींचने के लिये कुएँ से पानी निकालते हैं । + वि० दे० " मोटा" । मोटरी-संज्ञा स्त्री० गठरी । मोटा - वि० [ खो० मोटी ] जिसका शरीर चरबी आदि के कारण बहुत फूल गया हो । मोटाई -संज्ञा श्री० १. मोटे होने का भाव । २. शरारत । पाजीपन । मोटाना - क्रि० भ० १. मोटा होना । २. श्रभिमानी होना । मोटिया -संज्ञा पुं० १. मोटा और खुर- खुश देशी कपड़ा । खद्दद । खादी । २. बोझ ढोनेवाला । मोठ- संश खो० मूँग की तरह का एक मोटा अन । मोड़ -संज्ञा पुं० रास्ते आदि में घूम जाने का स्थान |