लिपि गीली वस्तु की वह चढ़वाना । पुताना । लिपि -संज्ञा ख० १. अक्षर या वर्ण के अंकित चिह्न । २. अक्षर लिखने जैसे -- ब्राह्मी लिपि, की प्रणाली । अरबी लिपि । जैसे- लिपिबद्ध - वि० लिखा हुथा । लि- खित | २. लिप्त - वि० १. लिपा हुआ । खुब तत्पर । अनुरक । लिप्सा-संज्ञा खी ० लालच । लोभ । लिफाफा -संज्ञा पुं० काग़ज़ की बनी हुई वह चौकोर थैली जिसके अंदर काग़ज़ पत्र रखकर भेजे जाते हैं । लिबड़ी-संज्ञा स्त्री० १. पुलिसवालों का सामान । २. असबाब । लिबास -संज्ञा पुं० पहनने का कपड़ा । पोशाक । लियाकत - संज्ञा स्त्री० योग्यता | लिलाट, लिलार* +-संज्ञा पुं० दे० "ललाट" । ६६६ लिवाना- क्रि० स० लेने या लाने का काम दूसरे से कराना । लिसोड़ा-संज्ञा पुं० एक मँझेाला पेड़ जिसके फल छोटे बेर के बराबर होते हैं । लिहाज़ -संज्ञा पुं० १. व्यवहार या बरताव में किसी बात का ध्यान । २. मुरव्वत । लिहाड़ा - वि० १. वाहियात । गिरा- हुआ । २. खराब । लिहाड़ी | - संज्ञा स्त्री० उपहास निंदा । । लिहाफ-संज्ञा पुं० रात को सोते समय ओढ़ने का रूईदार कपड़ा । लिहित- वि० चाटता हुआ । लुंचन लोक-संशा बी० लकीर । रेखा । लीख - संभा बी० जूँ का झंडा । लोचड़ - वि० सुख । काहिल । लोची- संज्ञा बी० एक सदाबहार बड़ा पेड़ जिसका फल मीठा होता है । लोभी- संज्ञा श्री० सीठी । वि० १. नीरस | निकम्मा । निस्सार । २. लीद - संज्ञा स्त्री० घोड़े, गधे, हाथी श्रादि पशुओं का मल । - लोन वि० [भाव० लीनता ] १. जो किसी वस्तु में समा गया हो । २. तन्मय । लोपना - क्रि० स० किसी गीली वस्तु की पतली तह चढ़ाना । लोल +- संज्ञा पुं० नील | वि० नीला । लोलना- क्रि० स० गल्ले के नीचे पेट में उतारना । लीला - संज्ञा स्त्री० १. वह व्यापार जो केवल मनोरंजन के लिये किया २. मनुष्यों के मनोरंजन के लिये किए हुए ईश्वरावतारों का अभिनय । जाय । वि० नीला । लोला पुरुषोत्तम - संज्ञा पुं० श्रीकृष्ण । लीलावती -संज्ञा स्त्री० प्रसिद्ध ज्योति- विद भास्कराचार्य की पत्नी जिसने लीलावती नाम की गणित की एक पुस्तक बनाई थी । लुंगाड़ा - संज्ञा पुं० शोहदा । लुच्चा । लुंगी-संज्ञा स्त्री० धोती के स्थान पर कमर में लपेटने का छोटा टुकड़ा । सहमत | लुंचन - संज्ञा पुं० चुटकी से पकड़कर
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