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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/६८०

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लेनहार ६७२ का व्यवहार । २. ऋण देने और लाई-संज्ञा बी० १. लेने का व्यवहार । लेनहार - वि० लेनेवाला । लेना - क्रि० स० १. दूसरे के हाथ से अपने हाथ में करना । २. थामना । ३. मोल लेना । करना । लेप-संज्ञा पुं० लेई के ४. अगवानी समान पोतने, छापने या चुपड़ने की चीज़ । लेपना- क्रि० स० गाढ़ी गीली वस्तु की तह चढ़ाना | ले- पालक - संथा पुं० गोद लिया हुआ पुत्र । दत्तक । लेरुषा - संज्ञा पुं० बछड़ा । लेव - संज्ञा पुं० लेप | लेवा-संज्ञा पुं० १. गिलावा । २. मिट्टी का गिलावा । वि० लेनेवाला । लोखर मुँधे हुए घाटे का उतना अंश जिसे बेलकर रोटी बनाते हैं । २. एक प्रकार का कम्मल । लेकिंजन - संज्ञा पुं० दे० "लेोपांजन" । लोकंदा / -संज्ञा पुं० विवाह में कन्या के डोले के साथ दासी को भेजना | लोकंदी ! - संज्ञा स्त्री० वह दासी जो कन्या के ससुराल जाते समय उसके साथ भेजी जाती है । लेक -संज्ञा पुं० १. स्थान- विशेष जिसका बोध प्राणी को हो । संसार | २. लोकधुनि-संज्ञा स्त्री० अफवाह | लोकना - क्रि० स० ऊपर से गिरती हुई वस्तु को हाथों से पकड़ लेना । लोकप, लोकपति -संज्ञा पुं० 1. ब्रह्मा । २. लोकपाळ । 1 लेवाल - सज्ञा पुं० लेने या खरीदने- लोकपाल -संज्ञा पुं० १. दसों दिशाओं वाला । लेश - संज्ञा पुं० श्रणु । वि० अल्प | थोड़ा । • लेहन- संज्ञा पुं० चाटना | लेसना - क्रि० स० १ जलाना । २. किसी चीज़ पर लेस लगाना । लेहाज़ा - क्रि० वि० इसलिए । इस वास्ते । लेह - वि० चाटने के योग्य । लैः - श्रन्य० तक | पर्यंत । लैस - वि० सजा हुआ । वर्दी और हथियारों से संज्ञा पुं० कपड़े पर चढ़ाने का फीता । लो- अव्य० दे० "लै” । लोंदा -संज्ञा पुं० किसी गीले पदार्थ का डले की तरह बँधा अंश । के स्वामी । २. राजा । लोकलीकः -संज्ञा स्त्री० लोक की मर्यादा | लेक संग्रह - संज्ञा पुं० संसार के लोगों को प्रसन्न करना । लोकहार - वि० लोक या संसार को नष्ट करनेवाला | लोकांतर-संज्ञा पुं० वह लोक जहाँ मरने पर जीव जाता है । लोकांतरित - वि० मरा हुआ । मृत । लोकाचार -संज्ञा पुं० संसार में बरता जानेवाला व्यवहार । लोकोक्ति-संज्ञा स्त्री० कहावत । मसब । लोकोत्तर - वि० बहुत ही अद्भुत और विलक्षण | लोखर -संज्ञा स्त्री० १. माई के