लोग चौज़ार । २. लोहारों या बढ़इये आदि के औज़ार । लोग-संज्ञा पुं० बहु० [ खी० लुगाई ] जन । मनुष्य । लाच - संज्ञा स्त्री० १. क्षचक । २. कोमलता । लोचन -संज्ञा पुं० श्रख । लोट-संज्ञा स्त्री० बोटने का भाव । संज्ञा पुं० उतार | ६७३ लोटन - संज्ञा कबूतर | लोटना- क्रि० भ० १. सांधे और उलटे पुं० एक प्रकार का लेटते हुए किसी और को जाना । २. विश्राम करना । लोटा-संज्ञा पुं० [स्त्री० भल्पा० लुटिया ] धातु का एक गोल पात्र जो पानी रखने के काम में श्राता है । लोटिया - संज्ञा स्त्री० छोटा छोटा । ले|ढ़ना क्रि० स० चुनना । छांटना । लोढ़ा - संज्ञा पुं० [स्त्री० अल्पा० लोढ़िया ] पत्थर का वह टुकड़ा जिससे सिल पर किसी चीज़ को रखकर पीसते हैं। बहा । लोदिया- संज्ञा श्री० छोटा लोढ़ा । लोथ, लोथि -संज्ञा स्त्री० मृत शरीर । द्वारा । लोथड़ा - संज्ञा पुं० मांसपिंड | लोध-संज्ञा बी० एक प्रकार का वृक्ष जिसकी छाल और लकड़ी दवा के काम में आती है। लोन -संज्ञा पुं० लवण | लोना - वि० [भाव० लोनाई ] १. नम- कीन । सलोना । २. सुंदर । संज्ञा पुं० दीवारों का एक प्रकार का रोग जिसमें वे झड़ने लगती और ४३ नमक । लोम कमज़ोर हो जाती हैं । लोनार - संज्ञा पुं० वह स्थान जहाँ नमक होता है । लोनिया -संज्ञा पुं० एक जाति जो लोन या नमक बनाने का व्यवसाय करती है । नेानियाँ | लोनी - संज्ञा स्त्री० कुल फे की जाति का एक प्रकार का साग । लेप-संज्ञा पुं० [ संज्ञा लोपन ] [ क्रि० लुप्त, लोपक, लेोप्ता, लोप्य ] १. नाश । क्षय । २. छिपना | अंतर्धान होना । लोपन - संज्ञा पु० लुप्त करना । तिरो- हित करना । 1 तोपना + - क्रि० स० १. लुप्त करना । २. छिपाना । क्रि० प्र० लुप्त होना । मिटना । लोपांजन-संज्ञा पुं० वह कल्पित चंजन जिसके विषय में यह प्रसिद्ध है कि इसके लगाने से लगानेवाला अदृश्य हो जाता है। लोबान -संज्ञा पुं० एक वृक्ष का सुर्ग- धित गोंद जो जलाने और दवा के काम में लाया जाता है 1 लोबिया-संज्ञा पुं० एक प्रकार का ( फली ) बड़ा बोड़ा । लोभ-संज्ञा पुं० [ वि० लुब्ध, लालचे । लिप्सा । लोभी ] लेभिना, लोभाना + - क्रि० स० मा- हित करना । मुग्ध करना । क्रि० प्र० मोहित होना । मुग्ध होना । मुग्ध । लोभित - वि० लुब्ध । लोभी- वि० जिसे किसी बात का लोभ हो । बाबची । सोम-संज्ञा पुं० शरीर पर के छोटे "
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