यत् यत् संज्ञा पुं० समान । घरस - संज्ञा पुं० १. गाय का बचा २. बालक । वत्सनाभ - संज्ञा पुं० एक विष जिसे 'बछनाग' या 'बच्छनाग' भी कहते हैं । वत्सर-संक्षा पुं० वर्ष । साथ । वत्सल - वि० [स्त्री० वत्सला ] बच्चे के प्रेम से भरा हुआ । चदते । व्याघात - संज्ञा पुं० कथन का एक दोष जिसमें कोई एक बात कहकर फिर उसके विरुद्ध बात कही जाती है । बदन - संज्ञा पुं० मुख । मुँह । वाम्य-वि० अतिशय दाता । उदार । वदि-संज्ञा पुं० कृष्ण पक्ष । जैसे- जेठ वदि ४ । - वध-संज्ञा पुं० जान से मार डालना । हत्या । वधिक-संज्ञा पुं० घातक । हिंसक | वधू-संज्ञा खो० नव-विवाहिता श्री । २. पुत्र की बहू । वधूटी - संज्ञा स्त्री० दे० "वधू" । वध्य-वि० मार डालने योग्य । धन-संज्ञा पुं० १. धन । जंगल । २. वाटिका । वनचर - वि० वन में भ्रमण करने या रहनेवाला । घनज-संज्ञा पुं० १. वह जो वन ( जंगल या पानी ) में उत्पन्न हो । २. कमल । चनदेव-संज्ञा पुं० [ श्री० वनदेवी ] वन का अधिष्ठाता देवता । चनमाला-संज्ञा बी० वन के फूलों की माला । वनमाली-संज्ञा पुं० श्रीकृष्णया । धनलक्ष्मी-संज्ञा श्री वन की शोभा । ६७७ वनश्री । वरंच वनवास-संज्ञा पुं० जंगल में रहना । वनवासी- वि० [स्त्री० वनवासिनो ] बस्ती छोड़कर जंगल में निवास करनेवाला । वनस्थलो-संश जी० वनभूमि । वनस्पति-संज्ञा खो० वृक्षमात्र । पेड़- वैधे । 1 वनस्पतिशास्त्र - संज्ञा पुं० वह शास्त्र जिसमें पौधों और वृक्षों आदि के रूपों, जातियों और भिन्न भिन्न अंगों का विवेचन होता है । वनिता-संशा बी० १. प्रिया । प्रिय- तमा। २. श्री । वनौषध-संज्ञा स्त्री० जंगली जड़ी-बूटी । वन्य- वि० १. वन में उत्पन्न होने- वाला । २. जंगली । वपन - संज्ञा पुं० बीज बोना । वपु - संज्ञा पुं० शरीर । देह । वफा - संज्ञा स्त्री० १. वादा पूरा करना । २. सुशीलता । वफादार - वि० [ संज्ञा वफादारो ] वचन यां कर्त्तव्य का पालन करनेवाला । वबाळ - संज्ञा पुं० १. बोझ । भार | २. आपत्ति । कठिनाई । चमन - संज्ञा पुं० कै करना । उलटी करना । चमि-संज्ञा श्री० वमन का रोग | वयःक्रम --संज्ञा पुं० अवस्था | उम्र । वयःसंधि-संज्ञा खो० वाहपावस्था और यौवनावस्था के बीच की स्थिति । वय-संश ० अवस्था | उन्न । वयस्क - वि० [ बी० नयस्का ] पूरी अवस्था को पहुंचा हुआा । समाना । वयोवृद्ध - वि० बड़ा बूढ़া1 घरंच - अव्य० १. ऐसा न होकर-
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