सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/६८६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

वर ऐसा। बल्कि । २. परंतु । घर - संज्ञा पुं० १. किसी देवता या बड़े से माँगा हुआ मनारथ । २. पति या दूल्हा । वि० श्रेष्ठ । उत्तम । जैसे- प्रियवर । घरक - संज्ञा पुं० १. पुस्तकों का पन्ना । २. सोने, चांदी आदि के पतले पन्तर । धरण- संघा पुं० १. किसी को किसी काम के लिये चुनना या मुकुर करना । २. कन्या के विवाह में वर को अंगीकार करने की रीति । वरद - वि० [स्त्री० वरदा] वर देनेवाला । परदानसंज्ञा पुं० किसी देवता या बड़े का प्रसन्न होकर कोई अभि- वषित वस्तु या सिद्धि देना । वरदानी - संज्ञा पुं० वर देनेवाला । वरदी -संज्ञा स्त्री० वह पहनावा जो किसी ख़ास महकमे के अफसरों और नौकरों के लिये मुकर्रर हो । वरन् - अव्य० ऐसा नहीं । बल्कि । वरना * - भव्य ० नहीं तो । यदि ऐसा न होगा तो । 1 घरम- संज्ञा पुं० दे० "वर्म" । वरयात्रा - संज्ञा खी० दूल्हे का बाजे- गाजे के साथ दुलहिन के घर विवाह के लिये जाना । वररुचि-संज्ञा पुं० एक अत्यंत प्रसिद्ध प्राचीन पंडित, वैयाकरण और कवि । वराटिका - संज्ञा स्त्री० कौड़ी । धरानमा - संज्ञा स्त्री० सुंदर स्त्री । वराह-संज्ञा पुं० शूकर । सूअर । वराहमिहिर -संज्ञा पुं० ज्योतिष के एक प्रधान आचार्य । बरिष्ठ - वि० श्रेष्ठ । पूजनीय । चंदवा - संज्ञा पुं० १. एक वैदिक देवता ६७८ वर्णविचार जो जल का अधिपति कहा गया है । २. जल । वरुणानी - संज्ञा श्री० वरुण की स्त्री । घरणालय- संज्ञा पुं० समुद्र । वरूथिनी - संज्ञा खी० सेना । वर्ग-संज्ञा पुं० एक ही प्रकार की अनेक वस्तुओं का समूह । जाति । कोटि । श्रेणी । वर्गफल-संज्ञा पुं० वह गुणन - फल जो दो समान राशियों के घात से प्राप्त हो । वर्गमूल-संज्ञा पुं० किसी वर्गीक का वह अंक जिसे यदि उसी से गुणन करें तो गुणन व्ही वर्गीक हो । जैसे - २५ का वर्गमूल ५ होगा । वर्गलाना- क्रि० स० बहकाना । फुसलाना । वर्जन-संज्ञा पुं० [वि० वर्जनीय, वर्ज्य, वर्जित ] मनाही । मुमानियत । वर्जित - वि० १. त्यागा हुआ । त्यक्त । २. निषिद्ध । वय - वि० छोड़ने योग्य । त्याज्य । वर्ण-संज्ञा पुं० १. पदार्थों के लाल, पीले आदि भेदों का नाम । रंग । २. जन-समुदाय के चार विभाग- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- जो प्राचीन आर्यों ने किए थे। जाति । ३. अक्षर । वर्णन-संज्ञा पुं० [वि० वर्णनीय, वर्ण्य, वर्णित ] १. चित्रयण । २. कथन । वर्णमाला - संज्ञा श्री० अथरों के रूपों की यथा श्रेणी लिखित सूची । वर्णविचार-संज्ञा पुं० आधुनिक व्या करपा का वह अंश जिसमें वर्षों के आकार, उच्चारण और संधि आदि