के नियमों का वर्णन हो । वर्णवृत्त - वंशा पुं० वह पथ जिसके चरणों में वर्णों की संक्या और लघु-गुरु के क्रमों में समानता हो । वर्णसंकर- संज्ञा पुं० वह व्यक्ति या जाति जो दो भिन्न भिन्न जातियों के स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हो । दोगला । ६७६ । धर्म-संज्ञा पुं० कवच । चकतर । वर्मा -संज्ञा पुं० चत्रियों आदि की उपाधि जो उनके नाम के अंत में लगाई जाती है । वय्र्य्य - वि० श्रेष्ठ । जैसे - विद्वद्व घर्वर - वि० १. असभ्य | वर्ष-संज्ञा पुं० काल का एक मान जिसमें बारह महीन होते हैं । वर्षगाँठ - संज्ञा स्त्री० दे० "बरस गाँठ | घर्षण - संज्ञा पुं० [वि० बर्षित ] वृष्टि | वाणत - वि० १. कथित । २. जिसका वर्षगांठ- वर्णन हो चुका हो । घराय - वि० वर्णन के योग्य । वर्धन- संज्ञा पुं० [वि० वर्त्तित ] बर- साथ | व्यवहार । वर्तमान- वि० १. चलता हुआ । २. मैौजूद । संज्ञा पुं० व्याकरण में क्रिया के तीन कालों में से एक, जिससे सूचित होता है कि क्रिया अभी चली चलती है । बर्त्तिका - संशा खी० १. बत्ती । २. राजाका । वर्त्तित - वि० १ संपादित किया हुआ । २. चलाया हुआ । वर्ती - वि० [खी० वचिनी ] बरतने- वाला । वर्त्तल - वि० गोल | वृत्ताकार । वर्त्म-संज्ञा पुं० मार्ग । पथ | थर्दी -संज्ञा श्री० दे० "वरदी" । वर्द्धन- संज्ञा पुं० [वि० वद्धित ] १. बढ़ाना । २ वृद्धि | वर्द्धमान - वि० जो बढ़ता जा रहा हो । संज्ञा पुं० जैनियों के २४वें जिन, महावीर । वर्जित - वि० बढ़ा हुआ । बरसना । २. नीच । वर्षफल - संज्ञा पुं० फलित ज्योतिष में वह कुंडली जिमसे किसी के वर्ष भर के ग्रहों के शुभाशुभ फलों का विवरण जाना जाता है । वर्षा - संज्ञा स्त्री० १. वह ऋतु जिसमें पानी बरसता है । २. पानी बरसने की क्रिया या भाव । वर्षाकाल - संज्ञा पुं० बरसात । वह संज्ञा पुं० मयूर । मोर । वलय- संज्ञा पुं० १. मंडळ । चूड़ी। वलवला - संज्ञा पुं० उमंग । प्रवेश | घलाहक- संज्ञा पुं० मेघ । बादल । चल सशा पुं० १. देवता को चढ़ाने - 1 २. की वस्तु । २. एक दैत्य जिसे विष्णु ने वामन अवतार लेकर चला था । घालत - वि० १. चल खाया हुआ । २. जिसमें झुरियां पड़ी हों । वली-सशा श्री० मुर्री। संज्ञा पुं० मालिक | वल्कल - संज्ञा पुं० वृक्ष घर - संज्ञा पुं० पुत्र । 0 शिकन । स्वामी । की छाल ! जैसे- "गोकुल वल्द नवदेव" अर्थात् 'गोकुळ, बेटा बलदेव का' ।
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