विश्वेश्वर नव देवताओं के गण । विश्वेश्वर - संज्ञा पुं० ईश्वर । विष-संज्ञा पुं० ज़हर । विषण्ण - वि० दुखी | विषधर संज्ञा पुं० साँप । विषमंत्र - संज्ञा पुं० १. वह जो विष उतारने का मंत्र जानता हो । २. संपेरा । विषम् - वि० १. असमान । २. बहुत कठिन । - ६६५ विषम ज्वर सेवा पुं० बाड़ा देकर आनेवाला ज्वर | विषमता - संज्ञा स्त्री० १. विषम होने का भाव । २. वैर । विषमवाण - संज्ञा पुं० कामदेव | विषय - संज्ञा पुं० १. वह जिस पर कुछ विश्चार किया जाय। २. स्त्री-संभोग । विषयक - अव्य० विषय का । - विषयी संग पुं० कामी । विषाक्त - वि० जिसमें विष मिला हो । जहरीला | विषाण-संज्ञा पुं० पशु का सींग । विषाद - संज्ञा पुं० [वि० विषादी ] खेद । विषुवत रेखा - संज्ञा स्त्री० ज्योतिष के कार्य के लिये कल्पित एक रेखा जो पृथ्वी तल पर उसके ठीक मध्य भाग में पूर्व-पश्चिम पृथ्वी के चारों ओर मानी जाती है। विष्टभ-संज्ञा पुं० बाधा । विष्ठा-संज्ञो जी० मल । विष्णु-संज्ञा पुं० हिंदुओं के एक प्रधान और बहुत बड़े देवता जो सृष्टि का भरण-पोषण और पालन करनेवाले माने जाते हैं। - वष्णुगुप्त संज्ञा पुं० एक प्रसिद्ध ऋषि और वैयाकरण जो कौटिल्य नाम से प्रसिद्ध थे । बिहार विष्णुपदी-संज्ञा श्री० गंगा नदी । विष्णुलोक-संज्ञा पुं० वैकुंठ । विसदृश - वि० विपरीत । विसर्ग-संज्ञा पुं० १. दान । त्याग । ३. व्याकरण में एक वर्ण जिसमें ऊपर नीचे दो बिंदु होते और जिनका उच्चारण प्रायः अर्ध ह के समान होता है । विसजन - संज्ञा पुं० १. परित्याग । २. बिदा होना । विसर्पी - वि० फैलनेवाला । विसाल - संज्ञा पुं० १. संयोग । २. मृत्यु | विसूचिका - संज्ञा स्त्री० वैद्यक के अनु- सार एक रोग जिसे कुछ लोग " हैज़ा" मानते हैं । विस्तार - संज्ञा पुं० फैलाव | विस्तीर्ण - वि० १. विस्तृत । २. वि. शाल । विस्तृत - वि० [ संज्ञा विस्तार, विस्तृति ] १. लंबा-चौड़ा । २. विशाल । विस्फोट - संज्ञा पुं० १. किसी पदार्थ का गरमी आदि के कारण उबल या फूट पड़ना । २. ज़हरीला और खराब फोड़ा | विस्फोटक - संज्ञा पुं० १. जहरीबा फोड़ा। २. भभकनेवाला पदार्थ । विस्मय- संज्ञा पुं० प्राश्चर्यं । विस्मरण - संज्ञा पुं० भूल जाना । विस्मित- वि० चकित | विस्मृत - वि० भूला हुआ । विस्मृति-संज्ञा श्री० विस्मरण । विहंग - संज्ञा पुं० १. पक्षी । २. बाया। विहग-संज्ञा पुं० दे० " विहंग" । विहार-संज्ञा पुं० १. टहलना ।
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