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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/७३५

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संस्मरण बठाना । ( भवन आदि ) २. खमाना | बैठाना | संस्मरण-संज्ञा पुं० पूर्ण स्मरण । खूप याद । संहरना- क्रि० प्र० नष्ट होना । क्रि० स० संहार करना । संहार - संज्ञा पुं० १. नाश । ध्वंस | २. समाप्ति । अंत | संहारक - संज्ञा पुं० संहार करनेवाला । नाशक । • संहार-काल-संज्ञा पुं० प्रलय काल । संहारना - क्रि० स० भार डालना । संहिता - संज्ञा स्त्री० वह ग्रंथ जिसमें पद, पाठ आदि का क्रम नियमा- नुसार चला जाता हो। जैसे- धर्म-संहिताएँ या स्मृतियाँ । सई - संज्ञा स्त्री० वृद्धि । बढ़ती । सउँ - अव्य० दे० "से" । सकट - संज्ञा पुं० गाड़ी । छकड़ा । सकत + - संज्ञा खो० बल । शक्ति | सकता-संज्ञा खी० शक्ति । ताक़त । सकपकाना - क्रि० प्र० १. श्राश्वर्य्य- युक्त होना । २. हिचकना । ३. हिलना - खोलना | सकरपाळा - संज्ञा पुं० दे० "शकर- पारा" । सकल - वि० सब । समस्त । कुल । संज्ञा पुं० निर्गुण ब्रह्म और सगुण प्रकृति | सकाना - क्रि० प्र० १. शंका करना । २. भय के कारण संकोच करना । काम - संज्ञा पुं० १. वह व्यक्ति जिसे कोई कामना या इच्छा हो । वह जो कोई कार्य फल मिलने की २. GRE इच्छा से करे | सखुआ सकारना- क्रि० प्र० स्वीकार करना । मंजर करना । सकारे + क्रि० वि० सवेरे । - सकिलना +- क्रि० म० फिसलना । सरकना । सकुच -संज्ञा स्त्री० लाज । शर्म । सकुचना- क्रि० प्र० १ बज्जा करना । २. ( फूलों का ) संपुटित होना । बंद होना । सबुचाई - संज्ञा स्त्री० लज्जा । सकुचाना- क्रि० भ० संकोच करना । क्रि० स० १. सिकोड़ना । २. किसी को संकुचित या लज्जित करना । सकुची - संज्ञा बी० कछुए के आकार की एक प्रकार की मछली । सकुन - संज्ञा पुं० पक्षी । चिड़िया । संज्ञा पुं० दे० 'शकुन" । सकुनी+-संश स्त्री० चिड़िया । सकूनत - संज्ञा जी० निवास स्थान । सकेलना | - क्रि० स० एकत्र करना । इकट्ठा करना । सकेला -संज्ञा खो० एक प्रकार की तलवार । सकोरा - संज्ञा पुं० दे० "कसोरा" । सक्का - संज्ञा पुं० भिश्ती । सक्ति-संज्ञा श्री० दे० "शक्ति" । सखरी संज्ञा खो० कधी रसोई । जैसे-दाल भात | सखा - संज्ञा पुं० १. साथी । २. मित्र | सखावत- संज्ञा स्त्री० दानशीलता । सखी-संज्ञा खी० १. सहेली | सह- चरी । २. संगिनी । बि० दाता । दानी । दानशील। सखुश्रा- संज्ञा पुं० दे० "शाख" । (वृक्ष) । ।