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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/७५०

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सरोष सरोष वि० क्रोधयुक्त | सरो-सामान संज्ञा पुं० सामग्री | - उपकरण । असबाब । सरौता - संज्ञा पुं० सुपारी काटने का एक प्रसिद्ध औज़ार । सर्ग - संज्ञा पुं० १. गमन । गति । २. किसी ग्रंथ ( विशेषतः ( अध्याय । प्रकरण । काव्य ) का सर्गबंध - वि० जो कई अध्यायों में विभक्त हो । सगुन वि० दे० "सगुण” । - ७४२ सर्ज संज्ञा पुं० १. बड़ी जाति का शाल वृक्ष । २. राल । ३. सनई का पेड़ । सजू - संज्ञा स्त्री० दे० " सस्यू” । सर्द - वि० टंढा | सर्दी-संज्ञा स्त्री० सर्द होने का भाव । शीतलता । सर्प-संज्ञा पुं० १. सपि । २. एक गरुड़ । म्लेच्छ जाति । सर्पकाल- संथा पुं० सर्पराज - संज्ञा पुं० १. शेषनाग । २. वासुकि । सर्पविद्या - संज्ञा श्री० सौंप को पकड़ने या वश में करने की विद्या । १. सॉपिन । २. सर्पिणी - संज्ञा श्री० १. भुज़गी लता । सर्फ - संज्ञा पुं० खर्च किया हुआ । लर्फा-संज्ञा पुं० व्यय । । सर्बस - संज्ञा पुं० दे० "सर्वस्व" । सर्राफ -संज्ञा पुं० दे० "सराकु" । सर्व - वि० • सब । कुल । सर्वकाम- संज्ञा पुं० शिव । सर्वगत- वि० सर्वव्यापक | सर्वव्यापी सर्वग्रास - संज्ञा पुं० चंद्र या सूर्य का पूर्ण ग्रहण | सर्वज्ञ - वि० सब कुछ जाननेवाला । सज्ञा पुं० ईश्वर । सर्वज्ञता - संज्ञा स्त्री० 'सर्वज्ञ' का भाव । सर्वतंत्र - संज्ञा पुं० सब प्रकार के शास्त्र- सिद्धांत । सर्वतः - भव्य ० १. सब ओर । २. सब प्रकार से | सर्वतोभद्र - वि० १. सब ओर से मंगल । २. जिसके सिर दाढ़ी, मूँछ श्रादि सबके बाल मुँड़े हों। सर्वताभाव- भली भाँति । अच्छी तरह । सर्वतोमुख - वि० १. जिसका मुँह चारों श्रोर हो । २. व्यापक । सर्पुत्र-व्य० सर्वत्र भव्य० सब कहीं । -- सर्वथा अव्य० सब प्रकार से । सर्वदर्शी संज्ञा पुं० सब कुछ देखने- वाला । सर्वदा - व्य० हमेशा । सदा । सर्वनाश-संज्ञा पुं० सत्यानाश । सर्वप्रिय - वि० जो सबको अच्छा लगे सर्वभक्षी - संज्ञा पुं० १. सब कुछ खानेवाला । २. अभि । सर्वभोगी - वि० सबका आनंद लेने- वाला । सर्वमंगला - संज्ञा श्री० १. दुर्गा । २. लक्ष्मी । I सर्वरी - संज्ञा स्त्री० दे० " शबेरी" । सर्वव्यापक-संज्ञा पुं० दे० "सर्व- व्यापी" । सर्वव्यापी - वि० सब में रहनेवाला ।