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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/७६७

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सिमटना पहुँचा हो । सिमटना- क्रि० प्र० १. सिकुड़ना । २. इकट्ठा होना । बटुरना । सिमाना+-संज्ञा पुं० सिवाना | हद । सिमिटना :- क्रि० प्र० दे० "सिम- टना" । सिय-संज्ञा खी० जानकी । सियरा - वि० [स्त्री० सियरी ] टंढा । शीतल । के सियराना- कि० अ० ठंढा होना । सिया संज्ञा स्त्री० जानकी । सियापा - संज्ञा पुं० मरे हुए मनुष्य शोक में बहुत सी स्त्रियों के इकट्ठा होकर रोने की रीति । सियार+- संज्ञा पुं० [स्त्री० सियारी, मियारिन ] गीदड़ । जंबुक | सियाल - संज्ञा पुं० गीदड़ । सियाहा -संज्ञा पुं० १. श्राय-व्यय की बही । २. सरकारी खजाने का वह रजिस्टर जिसमें ज़मींदारों से प्राप्त मालगुज़ारी लिखी जाती है सियाहानवीस - संज्ञा पुं० सरकारी ७५६ खजाने में सियाहा लिखनेवाला । सियाही संज्ञा स्त्री० दे० "स्थाही " । सिर- संज्ञा पुं० शरीर के सबसे अगले या ऊपरी भाग का गोल तल | कपाल । खोपड़ी । सिरकटा - वि० [ श्री० सिरकटी ] १. जिसका सिर कट गया हो । २. दूसरे का अनिष्ट करनेवाला । सिरका - संज्ञा पुं० धूप में पकाकर खट्टा किया हुआ ईख आदि का रस । सिरकी -संज्ञा स्त्री० १. सरकंडा । सरई । २. सरकंडे की बनी हुई रही। सिरजनहार- संज्ञा पुं० १. रचने- सिरोही वाला । २. परमेश्वर । सिरजना- क्रि० स० रचना । उत्पन्न करना । सिरताज - संज्ञा पुं० १. मुकुट । २. शिरोमणि । सिग्नामा - संज्ञा पुं० १. लिफाफे पर लिखा जानेवाला पता । २. शीर्षक । सिरनेत संज्ञा पुं० १. पगड़ी । २. क्षत्रियों की एक शाखा । - सिरपेच- संज्ञा पुं० पगड़ी | सिर पोश- संज्ञा पुं० सिर पर का श्रा- वरण | सिर फूल - संज्ञा पुं० सिर पर पहना जानवाला एक श्राभूषण । सिर बंद -संज्ञा पुं० साफ़ा । सिग्मौर संज्ञा पुं० १ सिर का मुकुट । २. शिरोमणि । सिरस संज्ञा पुं० शीशम की तरह का लंबा एक प्रकार का ऊँचा पेड़ । सिरहाना -संज्ञा पुं० चारपाई में सिर की ओर का भाग । सिरा- संज्ञा पुं० लंबाई का अंत | छोर । सिरानाक्षी - क्रि० प्र० ठंढा होना । शीतल होना । क्रि० स० १. ठंढा करना। २. जत में प्रवाहित करना । (प्रतिमा) सिरिश्ता-संज्ञा पुं० विभाग । सिरिश्तेदार-संज्ञा पुं० अदालत का एक कर्मचारी । सिरोमनि-संज्ञा पुं० दे० "शिरो- मणि" । सिरोरुह-संज्ञा पुं० दे० " शिरोरुह" । सिरोही-संज्ञा श्री० एक प्रकार की काली चिड़िया । संज्ञा पुं० १. राजपूताने में एक स्थान