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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/७८५

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ஏக सल - संज्ञा पुं० १. बरछा । २. दर्द । पीड़ा | सलना - क्रि० स० १. भाले से छेदना । २. पीड़ित करना । सलपानि-संज्ञा पुं० दे० "शूल- gifg" सली-संज्ञा स्त्री० १. प्राणदंड देने की एक प्राचीन प्रथा जिसमें दंडित मनुष्य एक नुकीले ले। हे के डंडे पर बैठा दिया जाता था और उसके ऊपर मुँगरा मारा जाता था । २. फांसी ।

  • संज्ञा पुं० महादेव ।

सस-सा पुं० मगर की तरह का एक c ७७७ बंदा जलजंतु । सूइँस । सलि† - सज्ञा पुं० दे० "सूस" | सृखला - संज्ञा स्त्री० दे० "श्रृंखला” । सुग-ज्ञा पुं० दे० "श्रृंग" । सृगवेरपुर-संज्ञा पुं० दे० "शृ'ग- वेरपुर" । सृगी-संज्ञा पुं० दे० "शृ ंगी" । सृक्क सज्ञा पुं० १. शूल । २. बाय । सृजक-संज्ञा पुं० सृष्टि करनेवाला । उत्पन्न करनवाला । सृजन :- संज्ञा पुं० सृष्टि करने की क्रिया उत्पादन । सृजनहारक-संज्ञा पुं० सृष्टिकर्त्ता । सृष्ट वि० उत्पन्न पैदा सृष्टि - संज्ञा स्त्री० १. उत्पत्ति । पैदा- इश । २. निर्माण । रचना । ३. दुनिया की पैदाइश । ४. संसार । सृष्टिकर्त्ता-संज्ञा पुं० ईश्वर । सृष्टिविज्ञान-संज्ञा पुं० वह जिसमें सृष्टि की रचना आदि पर विचार हो । शास्त्र सेक-संशा खो० सेंकने की क्रिया या भाव । सेख १. आँच के पास सेंकना - क्रि० स० १. या आग पर रखकर भूनना। २. श्रच के द्वारा गरमी पहुँचाना । सेंगर - संज्ञा पुं० १. एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है । २. एक प्रकार का अगहनी धान । ३. चत्रियों की एक जाति । - संत सज्ञा स्त्री० कुछ खर्च न होना । संत मेंत - क्रि० वि० १. बिना दाम दिए । मुफ़ में । २. व्यर्थ । सेंदुर - सज्ञा पुं० ईगुर की बुकनी । सिन्दूर | सेंदुरिया - संज्ञा पुं० एक सदाबहार पौधा जिसमें लाल फूल लगते हैं । वि० सिदूर के रंग का । खूब बाल | सध-सज्ञा स्त्री० वारी करने के लिये दीवार में किया हुआ बड़ा छेद | सुरंग । सेंधा - संज्ञा पुं० एक प्रकार का खनिज नमक | सैंधव । । सेंधिया - वि० दीवार में सेंध लगा- कर चोरी करनेवाला | संज्ञा पुं० ग्वालियर के प्रसिद्ध मराठा राजवंश की उपाधि | - धुर | संज्ञा पुं० दे० "सेंदु" । सेवई - संज्ञा बी० मैदे के सुखाए हुए सून के से लच्छे जो दूध में पकाकर खाए जाते हैं। 1 सेंवरः +- पंज्ञा पुं० दे० " सेमल" | हुड- संज्ञा पुं० दे० " थूहर" । - प्रत्य० करण और का चिह्न | अपादान कारक सेउ-संज्ञा पुं० दे० "सेव" । सेख:- संज्ञा पुं० १. दे० " शेष" । २. दे० " शेख " ।