स्पृश ७८७ याह क्रिया | स्पृश - वि० स्पर्श करनेवाला । स्पृश्य - वि० जो स्पर्श करने के योग्य हो । स्पृष्ट-वि० छूआ हुआ । स्पृहणीय - वि० वांछनीय | स्पृहा - संज्ञा श्री० इच्छा । स्पृही- वि० इच्छा करनेवाला | स्फटिक-संज्ञा पुं० एक प्रकार का सफेद बहुमूल्य पत्थर जो काँच के समान पारदर्शी होता है । स्फार - वि० प्रचुर । स्फीत - वि० १. वर्द्धित । २. फूला हुआ । स्फुट - वि० १. प्रकाशित । २. खिला हुआ । ३. फुटकर | स्फुटित - वि० विकसित । स्फुरण - संज्ञा पुं० किसी पदार्थ का ज़रा ज़रा हिलना । स्फुरित - वि० जिसमें स्फुरण हो । स्फुलिंग संज्ञा पुं० चिनगारी । स्फूर्ति - संज्ञा खी० तेज़ी । - स्फोट - संज्ञा पुं० १. फूटना । धड़ाका । स्फोटक-संज्ञा पुं० फोड़ा । २. स्फोटन -संज्ञा पुं० १. अंदर से फो- बना। २. विहारय । स्मर - संज्ञा पुं० कामदेव | स्मरण-संज्ञा पुं० याद श्राना । स्मरणशक्ति-संज्ञा श्री० याददाश्त । स्मरणीय - वि० स्मरण रखने योग्य । स्मरारि-संज्ञा पुं० महादेव । स्मशान-संज्ञा पुं० दे० " श्मशान" । स्मारक - वि० स्मरण करानेवाला । संज्ञा पुं० यादगार । स्मित- संज्ञा पुं० धीमी हँसी । वि० खिला हुआ । 1 स्मृत - वि० याद किया हुआ । स्मृति - संज्ञा श्री० १. स्मरण । २. हिंदुओं के धर्म्मशास्त्र । स्मृतिकार - संथा पुं० स्मृति या धर्म- शास्त्र बनानेवाला । स्पंदन - संज्ञा पुं० १. रथ । २. युद्ध में काम श्रानेवाला रथ । स्यमंतक -संज्ञा पुं० एक प्रसिद्ध मणि जिसकी चोरी का कलंक श्रीकृष्ण को लगा था । ( पुराण ) स्यात् श्रव्य० कदाचित् । स्याद्वाद-संज्ञा पुं० जैन दर्शन । श्रने- कांतवाद । स्थानप -संज्ञा पुं० दे० "स्थानपन" । स्थानपन - संज्ञा पुं० चतुरता । बुद्धि- मानी । स्याना - वि० [ खी० स्थानी ] १. चतुर । २. चालाक । ३. वयस्क | स्थापा - संज्ञा पुं० मरे हुए मनुष्य के शोक में कुछ काल तक स्त्रियों के प्रतिदिन एकत्र होकर रोने और शोक मनाने की रीति । स्याबास - अव्य० दे० "शाबाश" । स्यामः: - संज्ञा पुं०, वि० दे० "श्याम" । संज्ञा पुं० भारतवर्ष के पूर्व का एक देश | स्यामळ - वि० दे० "श्यामल" | स्यामा - संज्ञा श्री० दे० "श्यामा" । स्यार+ - संज्ञा पुं० [स्त्री० स्थारनी] गीदड़ । शृगाल । स्यारी - संज्ञा बी० सियार की मादा । गीदड़ी । स्याल - संज्ञा पुं० पत्रो का भाई । खाला। संज्ञा पुं० दे० "सियार" या "स्वार" स्थालिया । -संज्ञा पुं० गीदड़ । स्याह - वि० काला । कृष्ण वर्ण का ।
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