पृष्ठ:बिखरे मोती.pdf/२१०

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रसमस होकर देखते थे, उसी चाव से वे लोग इस काल की शृङ्गारिक । रस विभोर होकर सुनते थे । यद्यपि समस्त काव्य की प्रसार भूमि इस काल में नारी के साढ़े तीन हाथ शरीर में ही समाहित हो गई। । काल के कवियों ने नारी सौन्दर्य एवं उसको आकर्षक भाव-भंगिमा वन्त अभिव्यक्ति प्रस्तुत की उसमें ऐसा शाश्वत थाकर्पण था कि सहृदय उसकी उपेक्षा न कर सके । मतिराम, विहारी देव, घनानन्द तथा पद्माकर रचनाओ में जीवन का यही शाश्वत सत्य मुखरित हुआ था जिसके कारण एएँ उसी चाव से पड़ी अथवा सुनी जाती थीं, जिस चाव से लोग ताजमहल ही कला-वृष्टि को देखते थे। उस काल की कलात्मक इमारढों के प्रति लोगों । जैसे आज भी बना हुआ है, उसी प्रकार उस काल में रचे गए सरस एवं । की लोकप्रियता भी अक्षुण्ण हैं । इन रचनाओं का प्रमुख आकर्षण केन्द्र सरस एवं सुकुमार शृङ्गारिक भावना है न कि अलंकार एवं छन्दगत र । सम्पूर्ण काव्य की आत्मा कृष्णमय है, भूपण जैसे एकाध कवि भले ही

तियों को चुनौती देते हुए खड़े दिखलाई पड़ जायँ । वीरकाल के प्रणेता

ने को म्याङ्गारिक भावनाओं से मुक्त नहीं रख सके हैं। अलंकार बर्णन, । भैथ का चित्रण यद्यपि प्रभूत्र मात्रा में इस काल में मिलता है, पर मुसम्बन्ध व्यवस्थित रूप नहीं बन पाया। आचार्य कवि, केशव की प्रेरणा वों को इस काल के कवियों ने माघार अवश्य बनाया पर किसी एक पाटी का अनुसरण इन लोगों ने नहीं किया। किसी कवि ने केवल लक्षण |ी ने केवल उदाहरण प्रस्तुत किए। अधिकांश कवि ऐसे हैं जिन्होंने न और न तो उदाहरण ही प्रस्तुत किए। बिहारी जैसे एकाध कवि ऐसे भी जिनकी रचनाओं को लक्षण लिखकर उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया । इससे स्पष्ट है कि किसी एक शास्त्रीय स्यवस्था का निर्वाह इस काल ' में नहीं हुआ है, पर झार भावना नामक एक ऐसा तत्व है जो सभी उनकी कविताओं में समान रूप से पाया जाता है। ऐसी स्थिति में यदि इयं के इस उत्तर मध्यकाल को किसी नाम से सम्बोधित किया जा सकता झार कल' ही हो सकता है। इस नाम से इस काल की समस्त रचनाओं " ता है और इसके अन्तर्गत यदि हम चाहें तो सुविधा के लिए इस काल .'रीतिवद्ध' रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त' नामक उपशीर्षकों में विभक्त