पृष्ठ:बिहारी-सतसई.djvu/१७९

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। । १५९ सटीक : बेनीपुरी अन्वय-स्यामगात नख-रेख मरकत-माजन-सलिल गत इंदु-कला के बेख झीन झगा मैं झलमलत । मरकत = नीलमणि । भाजन = बर्तन । सलिल = जल । गत = में, अदर बेख =वेष = रूप, यहाँ समानता-सूचक है। झीन = महीन, बारीक । झगा = जामा, अंगरखा । नख-रेख = नख की रेखा, नख की खरौंट । (श्रीकृष्ण के ) साँवले शरीर में (समागम के समय राधा द्वारा दी गई ) नख की रेखा नीनमणि के बर्तन में मरे हुए जल में द्वितीया के चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के समान, महीन जामे के भीतर से झलमला रही है । नोट-श्यामसुन्दर का श्याम शरीर नीलमणि का पात्र है। बारीक श्वेत वस्त्र का जामा उस (मणि-पात्र) में रक्खा गया ( स्वच्छ ) जल है और नख की रेखा दूज का चाँद है। वैसीय जानी परति झगा ऊजरे माँह । मृगनैनो लपटी जु हिय वेनी उपटी बाँह ।। ३९५ ।। अन्वय-मननैनी हिय लपटी जु बाँह बेनी उपर्टी ऊजरे झगा माँह वैसीय जानि परति । बेनी-लम्बी चोटी। उपटी = दबकर दाग पड़ गया । मृगनैनी (नायिका) के हृदय में लिपटने से बाँह में जो ( उसकी ) वेणी का निशान पड़ गया है, सो उज्ज्वल जामे के अन्दर से वैसे ही स्पष्ट जान पड़ता है-दीख पड़ता है। वाही की चित चटपटी धरत अटपटे पाइ । लपट बुझावत विरह की कपट भरेऊ आइ ॥ ३९६ ।। अन्वय-चित वाही की चटपर्टी पाइ अटपटे धरत, कपट मरेऊ आइ बिरह की लपट बुझावत । चटपटी = चाह । अटपटे = उलटे-सीधे । लपट =ज्वाला। चित्त में तो उसी (अन्य स्त्री) की चाह लगी है। अतएव, पैर अटपटे पड़ते हैं-यथास्थान ठीक नहीं पड़ते । यो कपट से भरा हुआ मी-( यद्यपि