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पृष्ठ:बिहारी-सतसई.djvu/२०१

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सटीक:बेनीपुरी
 

मनु न मनावन कौं करै देतु रुठाइ रुठाइ।
कौतुक लाग्यौ प्यौ प्रिया खिझहूँ रिझवति जाइ॥४५२॥

अन्वय—मनावन कौं मनु न करै रुठाइ रुठाइ देतु, प्यौ कौतुक लाग्यौ प्रिया खिझहूँ रिझवति जाइ।

कौतुक = विनोद, मनोरंजन। लागै = निमित्त। खिझहूँ = खीझ (झुँझला) कर ही। रिझवति जाइ = प्रसन्न करती जाती है।

(प्रियतमा के रूठने को भावभंगी पर मुग्ध होने के कारण प्रीतम को प्रिया के) मनाने का मन नहीं करता, (अतएव) वह बार-बार उसे रुठा देता है। (इधर) प्रीतम के कौतुक के लिए प्रियतमा भी (झूठमूठ अधिकाधिक) खीझकर ही उसे रिझाती जाती है।

सकत न तुव ताते बचन भो रस कौ रस खोइ।
खिन-खिन औटे खीर लौं खरौ सवादिलु होइ॥४५३॥

अन्वय—तुव ताते बचन भो रस कौ रस खोइ न सकत, खिन-खिन औटे खीर लौं खरौ सवादिलु होइ।

ताते = (१) जली-कटी (२) गरम। रस = प्रेम। रस = (१) स्वाद (२) पानी। खिन-खिन = क्षण-क्षण। खीर लौं = (शीर) दूध की तरह।

तुम्हारी जली-कटी बातें मेरे प्रेम के रस को खो (सोख या सुखा) नहीं सकतीं—नष्ट नहीं कर सकतीं। (वह तो इन तप्त वचनों से) क्षण-क्षण (अधिकाधिक) औंटे हुए दूध के समान और भी अधिक स्वादिष्ट होता जाता है।

खरैं अदब इठलाहटी उर उपजावति त्रासु।
दुसह संक विष कौ करै जैसैं सोंठि मिठासु॥४५४॥

अन्वय—खरैं अदब इठलाहटी उर त्रासु उपजावति, जैसैं सोंठि मिठासु विष कौ दुसह संक करैं।

खरैं = अत्यंत। अदव = शिष्टता। इठलाहटी = ऐंठ भी। त्रास = डर। दुसह = कठोर। सोंठि मिठासु = सोंठ में मिठास आ जाने पर वह विपैली हो जाती है, खाने से दस्त-कै और सिर-दर्द होने लगता है।