| [चतुर्थ शतक १२०–१६१]
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| प्रेम-लक्षण |
३०१–३०४
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| प्रेमाश्वासन |
३०५–३०६
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| दूती |
३०७
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| अभिसारिका |
३०८–३१५
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| प्रिय-मिलनोत्कंठा |
३१६–३२०
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| दूती-वचन |
३२१–३२४
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| प्रथम मिलन |
३२५–३३०
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| सुरतारम्भ |
३३१–३३७
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| रति-क्रीड़ा |
३३८–३३९
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| विपरीत रति |
३४०–३४४
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| सुस्तान्त |
३४५–३४६
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| त्रिबली |
३४७
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| प्रेमक्रीड़ा |
३४८–३५७
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| मद-पान |
३५८–३६१
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| वन-विहार |
३६२–३६५
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| जल-विहार |
३६६–३६७
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| हिंडोला |
३६८–३६९
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| चोरमिहीचनी का खेल |
३७०
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| सुरत-जन्य शैथिल्य |
३७१–३७३
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| सखी-वचन |
३७४
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| रति-लक्षिता |
३७५–३७८
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| गर्विता |
३७९–३८१
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| खंडिता |
३८२–४००
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| [पंचम शतक १६१–२००]
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| खंडिता |
४०१–४२२
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| मानिनी |
४२३–४५०
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| क्रिया-विदग्धा |
४५१
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| मान और परिहास |
४५२–४५४
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| प्रेम-गर्विता |
४५५
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| पत्नि-अनुरागिनी |
४५६–४६१
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| उत्कंठिता |
४६२
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| दक्षिण नायक |
४६३
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| धृष्ट नायक |
४६४–४६६
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| ज्येष्ठा-कनिष्ठा |
४६७–४७२
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| पड़ोसिन का प्रेम |
४७३–४७५
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| विरह |
४७६–५००
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| [षष्ठ शतक २००–२४१]
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| विरह |
५०१–५३७
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| प्रेम-संदेश |
५३८
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| प्रेम-पत्रिका |
५३९–५४२
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| आगतपतिका |
५४३–५५२
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| फाग-रंग |
५५३–५५९
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| बसंत |
५६०–५६३
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| ग्रीष्म |
५६४–५६६
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| पावस |
५६७–५७८
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| शरद |
५७९
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| हेमंत |
५८०–५८३
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| शिशिर |
५८४–५८६
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| द्वितीया-चंद्र-दर्शन |
५८७–५८८
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| चाँदनी |
५८९
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| पवन |
५९०–५९४
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| कुलवधू |
५९५
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| ग्रामीण नायिका |
५९६–५९८
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| नायिका-स्नान |
५९९–६००
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