पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५१

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( ३८ ) गर्मी के बाद जाड़ा और जाड़े के बाद गर्मी आती है। द्वन्द्वचक्र सदा चला करता है । जो फूल आज पेड़ों पर है, वह कल पृथिवी पर गिरेगा । कोई पदार्थ नित्य नहीं दिखाई पड़ता। फिर क्यों लोग अपने सारे जीवन भर " मेरा तेरा " किया करते हैं ? हम पैदा होते समय क्या साथ लाए थे ? फिर यह अपने और पराए का भाव कहाँ से आया ? जब संसार दुःखमय है तब लोग इसे छोड़ क्यों नहीं देते ? छोड़ दें तो कहाँ जायें ? जंगलों में भी भूख-प्यास और आशा-तृष्णा साथ न छोड़ेगी । क्या इनसे बचने का कोई उपाय हो सकता है ? इत्यादि । इस प्रकार इस प्रासाद में रहते सिद्धार्थ को कई वर्ष वीत गए । जव कुमार अट्ठाईस वर्ष के हुए, तव महाराज शुद्धोदन को यह सुन अत्यंत प्रसन्नता हुई कि गोपा गर्भवती है। उनकी मुरझाई हुई आशा-लता फिर पनपने लंगी और उन्हें दृढ़ विश्वास हो गया कि संभव है कि मेरे इस प्रयत्न से सिद्धार्थ कुमार का चित्त वैराग्य से फिर जाय । गोपा को गर्भवती देख कपिलवस्तु में बड़ा आनंद. मनाया गया और सब शाक्य आनंद-समाज में सम्मिलित हुए; पर कुमार अपनी धुन में ही लगे रहे। उन्हें संसार के बंधन से स्वयं छुटकारा पाने और संसार को छुड़ाने की चिंता लगी थी। वे एकांत में बैठे हुए संसार के दुःख का निदान सोचा करते थे। __ एक दिन की बात है कि कुमार ने नगर से बाहर निकलने और आरामों में जाकर जी बहलाने की इच्छा प्रकट की । यह सुन महाराज शुद्धोदन ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि