पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/५४

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कि सारथे पुरुष दुर्वल अल्पस्थाम उच्छुकमांसरुधिरत्वचस्नायुनद्धः । श्वेतशिरो विरलदंत कृशांगरूप आलम्व्यदंडव्रजतेह सुखंस्खलन्त ॥ हे सारथी, यह पुरुष हाथ में लाठी लेकर टेकता हुआ क्यों लड़खड़ाता हुआ चलता है ? यह क्यों दुर्वल और स्थैर्ग्यविहीन है ? इसका मांस और रक्त क्यों सूख गया है ? क्यों यह इतना दुर्बल हो गया है कि इसके शरीर की नसें देख पड़ती हैं ? इसके सिर के वाल क्यों श्वेत हो गए ? इसके दाँत क्यों टूट गए ? इसकी क्यों ऐसी अवस्था हो गई है? कुमार का यह वचन सुन उनका सारथी बोला- एसो हि देव पुरुषोजरयाभिभूतः क्षीणेंद्रियो सुदुःखितो घलावर्य हीनो। बंधूजनेनपरिभूत अनाथभूतः कार्यासमर्थ अपिवृद्ध वने न दारु ।। हे देव, इस पुरुष को जरा वा बुढ़ापे ने घेर लिया है। इसकी इंद्रियाँ क्षीण हो गई हैं। यह दुःखित और बल-वीर्य्यहीन है । ऐसा देख इसे इसके बंधुजनों ने त्याग दिया है । यह अनाथ है । जैसे जंगल का जीर्ण काठ निकम्मा हो जाता है, वैसे ही यह भी निकम्मा हो गया है। सिद्धार्थ कुमार, जिन्होंने आज तक किसी जराग्रस्त पुरुष को नहीं देखा था और न जिनको यह ज्ञान ही था कि जरा क्या है,