पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/६१

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(४८ ) है। अब यह पुनः अपने कुटुम्बियों और जातिवालों को नहीं मिलेगा। ___ सारथी की इस बात ने कुमार के हृदय को हिला दिया। उन्हें सारा संसार क्षणभंगुर प्रतीत होने लगा। मानव जीवन का तत्व उनकी समझ में आ गया। वे जान गए कि यह जीवन, जिस पर समस्त प्राणी इतना घमंड करते हैं और जिसके लिये लोग बड़ी चढ़ी सामग्री जोड़ते हैं, वास्तव में चिरस्थायी नहीं है। अज्ञानी पुरुप जीवन को स्थिर समझ बड़े बड़े अत्याचार करते हैं; उनको स्वप्न में भी इसका ध्यान नहीं रहता कि जीवन क्षणिक है। कुमार थोड़ी देर इस चिंता में मग्न रहे; फिर सारथी से बोले- विग्यौवनेन जस्या समभिद्धतेन आरोग्य धिग्विविध व्याधि पराहतेन । धिक् जीवनेन पुरुषो न चिरस्थितेन धिक् पंडितस्य पुरुषम्य रतिप्रसंगैः ।। यदि नर न भवेयाः मैव व्याधिर्न मृत्यु- स्तथपि च महदुःखं पंचस्कधं धरतो। किं पुन जर व्याधि मृत्यु नित्यानुबद्धाः साधु प्रतिनिवर्त्य चिंतयिष्ये प्रमोचम् ।। यौवन को धिक्कार है, क्योंकि उसके पीछे जरा लगी हुई है। आरोग्य को धिक्कार है, क्योंकि अनेक प्रकार को व्याधियाँ उसे ध्वस्त किया करती हैं । जीवन को धिक्कार है, क्योंकि मनुष्य का जीवन चिरस्थायी नहीं है। और उस पंडित को धिक्कार है