पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/८९

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तप का अनुष्ठान किया। समाधि-अवस्था में उनका शरीर मृतवत्वा पापाणमूर्तिवत् हो गया। शुष्कमांसरुधिरचर्मस्नायवस्थिकाश्च अवशिष्टाः । . उदरं च पृष्टिवंशे विनिविश्यते वर्तिता यथा वेणी । · मांस और रक्त सूख गए, केवल चमड़ा, नसें और हड़ियाँ रह गई। पेट पृष्टिवंश में सिमटकर चोटी की तरह बल खा गया । जब इस प्रकार घोर अनशन व्रत करने से गौतम अत्यंत कृश और बलहीन हो गए, तब उन्हें यह अनुभव हुआ कि केवल शरीर को कष्ट देने से समाधि की सिद्धि नहीं हो सकती। जो पुरुष खयं अशक्त है, वह परम वलवान मन को कैसे वशीभूत कर सकता है। गोवा में भगवान ने कहा है- नात्यनतस्तु योगोस्ति न चैकांतमनश्नतः । न चातिवप्नशीलस्य जामतो नैव चार्जुन ।। युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। . हे अर्जुन ! योग की सिद्धि न अत्यंत भोजन करनेवाले ही को होती है और नं नितांत अन्न जल.त्यागकर अनशन व्रत करनेवाले ही को होती है। जो सदा अधिक सोया करता है और जो बहुत जागता है, वे दोनों योग के अधिकारी नहीं हैं । योग का अधिकारी । वही पुरुप है जिसके आहार-विहार नियमित हैं, जो कर्म में युक्त चेष्टा करता और जो मात्रानुसार सोता और जागता है। ऐसे ही लोगों को दुःखों का नाश करनेवाला योग सिद्ध होता है।