काकी उपमा वाहि दीजिये व्यापक गुन जेहि मांडी। हिय अन्तर अधिधार दराने अपहु नाहिं बचि जाही। सिंधु लहरह सिंधुमयी है मूढ करे जो लेखे । नाही तो 'हरीचंद' सरीखे तरत पतित कहूँ देखे । सुगति कति सब ही अति समुचित हम पतितन के दाव। बरन बरन प्रगटत ही आवत सन विराट अनुहारी। जो तून-मात्रहु न्याव करो प्रभु करि शास्वन पै नेह । तो हम कठिन नरक के लायक यामै कडून संदेह। ->* तब विरह-अगिन तन तानी । पेजो ढरौ नाच करूना-दिसि तौ का मेरे पाप 'हरीचद' इक-रस तुमसो मिति कोटि कोटि वैकुंठ सुलभ तर तनिक कटाक्ष-प्रताप । अति अनंद मन माची । जो हमरी दिसि एतखहु उचित ती सब विधि दंड-विधान । प्यार यह नाहि जानि परी। 'हरीनंद' तो यही जोग यै तुम प्रभु दयानिधान ।१० नाथ समुझि यह धरयो तुमहि के तुन मोहिं प्रभो वरी । जिन नहिं श्री कल्लभ-पद गहे। हम भाजत पै तुम गहि राखत परवस करत निघाह । ते भवसिधु-धार में साधन करत करत- पहे उलटी गति दिनराति मनो तुमहीं कहें मेरी चाह । | परम तत्व जानत नहिं कोऊ उद्यपि शास्त्रन कहे । इम अपराध करत नहि चूकत विचलायत विश्वास । से इनके किंकर-जन ही के कर-अमलक खै रहे । तुम तेहि छमा करत गहि गहि भुज औरह खीचत पास। नवनीत-प्रिय हाथ लगत नहि स्तुति-पय अरबस महे। दास होइ हम अति अभिमानी वचक निमक-हराम 'हरीनंद' पिन पैश्वानर-अल करम-काठ किन दहे ।११ - तुम स्वामी समरथ कानामय क्यो पनि रहे गुलाम कहाँ लौ निज नीचता अचानौं। वो हम कह करनी चाहत ही सो तुम उलाटी कीन्ही जाव खो तुमसो बिछुरे तब सो ऽच ही जनम सिरानी । प्रियतम हवे प्रेमी समान सब सब चाल जनन सों लीन्ही। दुष्ट सुभाष पियोग खिस्याने संग्रह कियो सहाई । यह उदारता कह लो गाओं बने तुमहि सो नाथ सूखी लकरी वायु पाइ के चलौ अगिन उलढाई । नाही तो 'हरिचद' पतित को कोन निबाहै साथ ।६ जनम जनम को बोझ जमा करि भारी गांठ बंधाई । याही सो घनश्याम कहावत । उठिन सकत गर पीठ टि गई अब इतनी गसआई। द्रवत दीन-दुरवसा बिलोकत करना रस वरसावत । | बूड़त तेहि लेके भव-धारा अब नहिं कछुक उपाई। भीगे सदा रहत हिय रस सों जन-मन-ताप जुड़ाषत। हरीचंद लमही चाहो तो तारो मोहि कन्हाई ॥१२ 'हरीचंद से चातक जन के जिय की प्यास बुभावत ॥७ में सेवक निमकहराम हरि- र-तन किसना-सरिता बाढ़ी। चाह खाइ के महा मुटैहों करिहों कह न काम । दुखी देखि नित्र जन धिनु साधन उमगि चलो अति गाई। बात बनेझी लांबी-चौड़ी बैठ्यो बैठयो धाम । तोरि कुल मरजादा के दोउ न्याव-करार गिराए । प्रिनहु नाहिं इत उत सरकैहो रहिहो बन्यौ गुलाम । जित तित परे करम फल-तरूगन बड़ सो तोरि बहाए। | नाम विहीं तुमरो करि करि उलटो अध के काम । अन्वत बिरुद गंभीर भतर गहि महा पाप गन घोरे । 'हरीचंद' ऐसन के पालक तुमहि एक घनश्याम ।१३ असहन पवन बेग अति बेगहि दीन महान हलोरे । उमरि सब दुख ही माँडि सिरानी । भरि दीने जन हुदव-सरोवर तीनहुँ ताप बुझाई । अपने इनके उनके कारन रोअत रैन बिहानी । 'हरीचंद' हरि-उस-समुद्र में मिली उमगि हरखाई । जहं सुख की आसा करिकै मन बुधि सह लापटानी। प्रभु की कृपा तई तह धन संबंध जनित दुख पायो उलटि महानी । करुना में करूनानिधिही के इती बड़ाई पैयै । सादर पियो उदर भरि विष कह धोखे अमृत जानी । | पात पात वह बोले। बिद् वह डोले। बेस सिरानी रोअत रोअत । जु यह यह रेनु रेनु घाये। दीप दीप जो यह समान यह किरिन किरिन अनि जाये। सपनेहुँ चौकि तनिक नहि जागी बीटी सम्ही सोअत। गई कमाई दर | रहे गांठ को खोजत । प्रभु हो जो करिहौ सोइ न्याप प्रभु 'हरीचंद' माया-मंदिर सो मति सब विधि बीरानी ।१४ डार डार जो नदी नदी जो पाप नलत चल तथला में छिपि रहत और काजरो तन लपटानी मन जानी हम धोअत । स्वाद मिलौ न मजूरी को सिर ट्यो बोझा दोन । 'हरीचंद' नहिं भर्यो पेट पे हाथ जरे दोउ पोअत ।१५ नाहिने या आसा को अंत । बढ़त द्रोपदी-चीर-सरिस जब जरे तंत में संत । चक्यो दुसासन जीव वापुरो खीचत खीचत हारी। जिमि तित वसन बनाइ कहाए भगत-बछल महराज। 1 विनय प्रम पनासा १६५
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