(Bhatti), दारद (Dardareans) और गांधार (Kandharians) ब्राह्मण होते थे । फिर तुजान नामक राजा के समय में चंद्रक कवि ने नाटक बनाया । (२ त. १६ श्लो.) इसके समय में एक बात और आश्चर्य की लिखी है कि एक समय बड़ा काल पड़ा था तो परमेश्वर ने कबूतर बरसाये थे । (२ त. ५१ श्लो.) और हर्ष नामक एक कोई और राजा उस काल में हुआ था । इस राजा के कुछ काल पीछे संधिमान राजा की कथा भी बड़ी आश्चर्य की लिखी है कि वह सूली दिया गया था और फिर जी गया इत्यादि । विक्रमादित्य के मरने के थोड़े ही समय पीछे प्रवरसेन राजा ने नाव का पुल बाँधा और वह ललाट में त्रिशूल की भाँति तिलक देता था (३ त.३५६ और ३६७ श्लो.)। जयापीड़ राजा का समय फिर ध्यान देने के योग्य है. क्योंकि इस के समय में कई पडित हुए हैं, जिनमें शंक नामक कवि ने मम्म और उत्पल की लड़ाई में भुवनाभ्युदय नामक काव्य बनाया था । (४ त. २५ श्लो.) इसी समय में वामन नामक वैयाकरण पटित हुआ है जिस की कारिका प्रसिद्ध है । (४ त. ४८७ से ४९४ श्लो. तक) इसी वामन का बोपदेव ने खंडन किया है । (बोपदेव महाग्राहग्रस्तो वामने कुंजर ) इससे बोपदेव जयापीड़ के समय (७५ ई.) के पीछे हुए हैं यह सिद्ध होता है । जयापीड़न द्वारका फिर से बसा कर मंदिर बनवाए । (४ त. .५६० श्लो.) और उस समय नैपान का राजा अरमुड़ि था (४ त. ५२९ श्लो.) । राजा शंकरवर्मा का समय भी दृष्टि देन योग्य है.। इसके पास ३०० हाथी, लाख घोड़े और नौ लाख प्यादे थे। उस समय गुजरात में 'खानाल खान' का जोर था । दरद और तुरष्क देश के राजा भारत में बड़ा उपद्रव मचाए हुए थे । लल्लियशाह खानालखान का सार था (५ त. १५३ से १६० श्लो. तक) । इस ग्रंथ में मुसलमानों का वर्णन पहले यहीं आया है । इससे स्पष्ट होता है कि ईस्वी नवीं शताब्दी के अंत तक जो मुसल्मान चढ़ाई करते थे वे गुजरात की राह से करते थे ; उत्तर पश्चिम को राह नहीं खुली थी । इस तरंग में कायस्थों की बड़ी निंदा की है (४ न. ६२५ श्ला. से और ५ त. १७२ श्लो. आदि)। चतुर्थ और पंचम तरंग में कई बात और दृष्टि देने के योग्य है । जैसे ताँबे की 'दीनार' पर राजाओं का नाम खुदा रहना । (४ न. ६२० श्लो.) जहाँ पथिक टिके उस स्थान का नाम गंज (४ न. ५५२ श्लो.) । रुपयों की इंडिका (हडी) का प्रचार । (५ त. १५९ श्लो.) मेष के ताजे चमड़े पर खड़े होकर तलवार दात्न हाथ में लेकर शपथ खाना इत्यादि (५ त. ३३० वा.) । इसी तरंग में गानेवालों का नाम डोम लिखा है । (५ त. ३५८ श्ला.) यह दीनार . गंज. हड़ी और डाम शन अब तक भाषा में प्रचलित है, वरच मीरहसन ने भी 'डोमनपना' लिखा है । जैसा इस काल में रडा और इन की त्रुढिया तथा भडुओं के समझने की और साधारण लोग जिस में न समभै ऐसी एक भाषा प्रर्चालन है. वैसी ही उस काल में भा थी । गाने वाले को हेलू गांव दिया गया. इसकी उस काल की भाषा हुई 'रंगस्महरायुनिराणा' (५ त. ४०२ श्लो.) । पष्ट तरंग म दिद्दारानी का उपद्रव और बहुत से राजा यों के नाम के पूर्व में शाहि पद ध्यान देने के योग्य साप्तम नरग (५३ श्लो.) में हम्मार नाम का एक राजा लूंग के समय में और (१९० श्लो.) अनंत के समय में भोज का राजा हाना लिखा है । मान के हेतु लोगो का ठाकुर का पदवा दी जाती थी । (७ त. २९ श्तो.) तुरष्क देश से सोने का मुलम्मा करने की विद्या हर्ष के समय में आई । (७ त. ५३ श्लो.) इसी काल में खस लोगों न पहल पहल बंदूक का युद्ध किया । (७ न. ५८४ जना.) कालवर के गजा. राजा उदय सिंह आदि कई राजाओं के प्रसंग से (१३०० ता. के आसपास) नाम आए है । युद्ध हारन के समय क्षत्रानिया राजपुतानं की भाँत यहाँ भी जल जाती थी। (७ त..१५०० ला.) । यथा १. वर्तमान काल में रंडियों की भाषा का कुछ उदाहरण दिखाते हैं। नगर की वारबधूगण की संकेत भाषा लूरा-पुरुष, लूरी-रंडी, चीसा-अच्छा बीला बुरा, भीमटा रुपया आदि । ग्राम्य रंडियों की भाषा यथा-सेरुआ- पुरुष, सेरुइ-स्त्री, कनेरी-रुपया, सेमिल-अच्छा है और छौलिआयत्य : अर्थात् रुपया सब ठग लो। k काश्मीर कुसुम ७११
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