पाया हृमी लै था कभी जो योज वर विज्ञान क',
उसको दिया है दूसरों ने रूप म्योद्यान का ।
हम किन्तु खो बैठे उसे भी जो हमारे पास था,
है ! दूसरों की वृद्धि में ही क्या हमारा हृास था ।।१११।।
हैं राष्ट्रभाषा भी अभी तक देश में कोई नहीं,
हम निज विचार जला सके जिससे परस्पर सब कुहुँ ।
इस योग्य हिन्दः तदपि अब तक न निज पद पर सी,
भाषा विना भावैकता अब तक न हममें आ सकी ! ।।११२।।
यों तो स्वभाषा-सिद्धि के सब प्रान्त हैं लाइक यहाँ,
पर एक उद्दाँ अधिकतर बन रहे वार्धक यहाँ ।।
भगवान जाने देश में कच अाय अब एकता,
हठ छोड़ दो हे भाइयो ! अच्छी नहीं अविवेकता ।।११३।।
विद्या हमारी भी न तब तक काम में कुछ अाय--
अद्धाङ्गियों को भी सु-शिक्षा दी ने जब तक जायगी।
सुधाङ्ग के बदले हुई यदि व्याधि पक्षाघात की-
तो भी न क्या दुर्बल तथा व्याकुल रहेगा घातकी ? ।।११४।।
सुख-शान्ति मय सरकार का शासन समय है अब यहाँ,
सुविधा समुन्नति के लिए हैं प्राप्त इसको सब यहाँ ।
अब म न यदि कुछ कर सके हम तो हमारी भूल है,
अनुकूल अक्सर की उपेक्षा झूलती फिर शूल है ।।११५।।