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पृष्ठ:भारत भारती - श्रि मैथिलिशरण गुप्त.pdf/५७

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अतीत-खण्ड


अब चित्रशालाएँ हमारी जम शेष हुई” यहाँ,
पर आज भी अादर्श उनके हैं अनैक जहाँ तहाँ ।
अब भी अजेंटा को गुफाएँ चित्त को हैं मोहती;
निज दर्शकों के धन्य रव से गूंज ऊर हैं सोतः ।।११६।।

सूतिनिर्माण होता न भूति-विधाते यदि साधन हमारे देश का-
पूजन न घडश-विधि यहाँ होता सम सॉश की।
अनुभव न होता एक सीमा में असमाधार का,
होता निदर्शन भी न उस हृदयस्थ रूपोद्गार का ।। ११७।।

निज रूप से भी दूसरे जन जिस समय अज्ञान थे--
हम उस समय प्रभु-मूति का प्रत्यक्ष करते ध्यान थे।
ऐसा न करते तो भला हम भक्ति प्रकटाते कहाँ ?
दुर्शन-विलम्वाकुल दृगों को हाय ! ले जाते कहाँ १ ।। ११८ ।।

 अब तक पुराने खंडहरों में, मन्दिरों में कहीं,
बहु मूतियाँ अपनी कला का पूर्ण परिचय ६३ ।
प्रकटी रही हैं भग्न भी सौंदर्य की परिष्टता,
दिखला रही हैं साथ ही दुष्कमियों को दुष्टतः ।। ११९ ॥

सङ्कत

लोकेरक्ति गन्न तथा ना किसे असः नहीं,
पर गान जो शास्त्रीय है उत्पत्ति उसकी है यहीं !
अकरे भयङ्कर भाव जिस स त में अब हैं भरे,
हरि के रिझा करे हम उसी साम / किया करे ।।१२०।।