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पृष्ठ:भारत भारती - श्रि मैथिलिशरण गुप्त.pdf/९६

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भारत-भारती




'प्राचीन चिन्ह


प्राचीनता के चिन्ह भी क्या अब तुम्हारे रह गये ?
खंडहर खड़े हैं कुछ सही, पर आज वे भी हैं नये ।।
सुनते यही हैं हाय ! हम जा पहुँचते हैं जब वहाँ
केाई हमें वे मत कहो, देखो न, अब हम वे कहाँ " ।।४।।

उन मन्दिरों के ढेर ऊँचे, आद्रि-रूप, उजाड़ हैं;
हा पूर्वजों की बैठकों पर दीखते अव झाड़ हैं ।
वे झाड़ मर-मिस पवन में मर रहे थे शब्द हैं-
जो थे यहाँ उनको हुए बोते अनेकों अब्द हैं ! ।।५।।

जिन ४४ सौंधों में सुगायक श्रुति-सुधा थे घोलते,
निशि-मध्य टीलों पर उन्हीं के आज इल, बोलते ।
‘सेते रहा हे हिन्दुओं ! हम मौज करते हैं यहाँ,
प्राचीन चिन्ह विनष्ट यकिस जाति के होंगे कहाँ ?।।६।।

श्रुति, शास्त्र और पुराण का होता जहाँ प्रिय-पाठ था,
सुन्दर, सुखद, शुचि सत्त्व गुण का एक अद्भुत ठाठ था । जम्बुको अचानक अब वहाँ को शान्ति करते भङ्ग हैं,
आकाश के बहु रङ्ग-जेंस भूमि के भी ढङ्ग हैं ।।७।।

आमोद बरसाती जहाँ थी यज्ञ-धूममय घटा,
यश-तुल्य जिस अमोद की थी स्वर में छाई छटा ।
अब प्लेयजैसी व्याधियों की है वहाँ फली हवा,
चलती नहीं जिस पर धुरन्धर डाक्टरों की भी दुवा: ।।८।।

१–बई ।।