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पृष्ठ:भारत में अंगरेज़ी राज.pdf/२५

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भारत में अंगरेज़ी राज

११२४ भारत में अंगरेज़ी राज कारण यह है कि समस्त देश धीरे धीरे निर्धम होता जा रहा है । हाल में जब से हिन्दोस्तान के बने हुए सूती कपड़ों की जगह इनलिस्तान के बने , हुए कपों को इस देश में प्रचलित किया गया है तब से यहीं के कारीगरों के लिए जीविका निर्वाह के साधन बहुत कम होगए हैं। हमने अपनी बहुत सी पलटनें अपने इलाक़ों से हटा कर उन देशी राजाओं के दूर दूर के इलाकों में भेज दी हैं, जिनके साथ हमने सन्धियों की हैं, हाल ही में इससे भी नाज की माँग पर बहुत बड़ा अंतर पढ़ा है । देश का धन पुराने समय के देशी दरबारों और देशी कर्मचारियों के हाथों से निकल कर यूरोपियों के हाों में चला गया है । देशी दरबार और उनके कर्मचारी उस धन को भारत ही में उदारता के साथ व्यय किया करते थे, इसके विपरीत नए यूरोपियन कर्मचारियों को हमने क़ानून आज्ञा दे दी है कि वे प्रस्थायी । तौर पर भी इस धन को भारत में व्यय न करें । ये यूरोपियन कर्मचारी देश के श्रम को प्रति दिम ढी ढो कर बाहर ले जा रहे हैं, इसके कारण भी यह देश दरिद्र होता जा रहा है । सरकारी लगान जिस कड़ाई के साथ बसूल किया जाता है उसमें भी किसी तरह की ढिलाई नहीं की गई, जिससे प्रजा के इस कष्ट में कोई कमी हो सकती । मध्यम श्रेणी और निम्न श्रेणी के अधिकांश लोग अब इस योग्य नहीं रहे कि अपने बच्चों की शिया का ख़र्च बरदाश्त कर सकें, इसके विपरीत वही उनके बच्चों के कोमल मन थोड़ी बहुत मेहनत कर सकने के भी योग्य होते हैं , मात। पिता को अपनी ज़िन्दगी की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए उन बच्चों से अब मेहनत मजदूरी करानी पड़ती है । अर्थात् उन्नीसवीं शताब्दी के शुरू में भारत की प्राचीन