क़रीब क़रीब सभी अंगरेज़ शासक भारतवासियों को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे।
जे॰ सी॰ मार्शमैन ने १५ जून सन् १८५३ को पार्लिमेण्ट की सिलेक्ट कमेटी के सामने गवाही देते हुए कहा था—
"भारत में अंगरेज़ी राज के क़ायम होने के बहुत दिनों बाद तक भारतवासियों को किसी प्रकार की भी शिक्षा देने का प्रबल विरोध किया जाता रहा।"[१]
मार्शमैन बयान करता है कि सन् १७९२ में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए नया चारटर एक्ट पास होने का समय आया तो पार्लिमेण्ट के एक सदस्य विलबरफ़ोर्स ने नए क़ानून में एक धारा इस तरह की जोड़नी चाही जिसका ज़ाहिरा अभिप्राय थोड़े से भारतवासियों की शिक्षा का प्रबन्ध करना था। इस पर पार्लिमेण्ट के सदस्यों और कम्पनी के हिस्सेदारों ने विरोध किया और विलबरफ़ोर्स को अपनी तजवीज़ वापस ले लेनी पड़ी।
मार्शमैन लिखता है—
"उस अवसर पर कम्पनी के एक डाइरेक्टर ने कहा कि—हम लोग अपनी इसी मूर्खता से अमरीका हाथ से खो बैठे हैं, क्योंकि हमने उस देश में स्कूल और कॉलेज क़ायम हो जाने दिए, अब फिर भारत के विषय में
- ↑ "For a considerable time after the British Government hab been established in India, there was great opposition to any system of instruction for the natives"—J. C. Marshman, in his evidence before the Select Committee of the House of Lords appointed to enquire into the afairs of the East India company, 15th June, 1833.