हमारा उसी मूर्खता को दोहराना ठीक नहीं है।' x x x इसके बीस वर्ष बाद तक यानी सन् १८१३ तक भारतवासियों को शिक्षा देने के विरुद्ध ये ही भाव इंगलिस्तान के शासकों के दिलों में कायम रहे।"[१]
सन् १८१३ में विलायत के अन्दर सर जॉन मैलकम ने, जो उन विशेष अनुभवी नीतिज्ञों में से था, जाति पाँति अंगरेज़ों को लाभ जिन्होंने १९वीं सदी के शुरू में भारत के अन्दर अंगरेज़ी साम्राज्य को विस्तार दिया, पार्लिमेण्ट की जाँच कमेटी के सामने गवाही देते हुए कहा—
"x x x इस समय हमारा साम्राज्य इतनी दूर तक फैला हुआ है कि जो असाधारण ढङ्ग की हुकूमत हमने उस देश में कायम की है उससे बने रहने के लिए केवल एक बात का हमें सहारा है, वह यह कि जो बड़ी बड़ी जातियाँ इस समय अंगरेज़ सरकार के अधीन हैं वे सब एक दूसरे से अलग अलग हैं, और जातियों में भी फिर अनेक जातियाँ और उप जातियाँ हैं; जब तक ये लोग इस तरह एक दूसरे से बटे रहेंगे, तब तक कोई भी बलवा हमारी सत्ता को नहीं हिला सकता। x x x जितना जितना लोगों में एकता पैदा होती जायगी और उनमें वह बल आता जायगा जिससे वे
- ↑ "On that occasion, one of the Directors stated that we had just lost America from our folly, in having allowed the establishment of schools and colleges, and that it would not do for us to repeat the same act of folly in regard to India; . . . For twenty years after that period, down to the year 1813, the same feeling of opposition to the education of the natives continued to prevail among the ruling authorities in this country."—J. C. Marshman, 15th June, 1853 Ibid.