परप्रत्यय २०६ भाषा-विज्ञान संयुक्त होकर आते हैं तक तो वे निश्चय ही पूर्व-प्रत्यय होते हैं । प्र१, परा, अप आदि ऐसे ही पूर्व-प्रत्यय हैं। ये क्रिया और संज्ञा दोनों के साथ पाए जाते हैं । इनके अतिरिक्त अन्य अनेक ऐसे क्रिया-विशेषण होते हैं जो प्रायः पूर्व-प्रत्यय हो जाया करते हैं जैसे अच्छ, श्राविस, तिरस, पुरस, प्रादुः, वहिः, अंतः विना, अलम्, साक्षात् आदि । शब्द-साधक परप्रत्ययों का तो संस्कृत में बाहुल्य है । इनके दो मुख्य भेद किए जाते हैं-(१) प्रधान अथवा धातु-प्रत्यय और (२) गौण अथवा अधातु-प्रत्यय । इन नामों से ही प्रकट हो जाता है कि पहले प्रकार के प्रत्यय धातुओं से और दूसरे प्रकार के प्रत्यय अधातुओं से लगते हैं। संस्कृत व्याकरण के कृत् और उणादि प्रत्यय पहले वर्ग में और तद्धित प्रत्यय दूसरे वर्ग में आते हैं। मन् से मति बनाने में 'ति' प्राथमिक अथवा धातु-प्रत्यय लगता है पर मति से मतिमान् बनाने में जो मत् ( अथवा मान् ) लगता है वह गौण अर्थात् तद्धित प्रत्यय है । इन प्रत्ययों के विपथ में एक बात यह भी जान लेनी चाहिए कि संस्कृत में एक शब्द में प्रायः एक धातु और एक विभक्ति रहती है, पर शब्द-साधक प्रत्यय अनेक हो सकते हैं। इनके क्रम के विषय में भी निश्चित नियम रहते हैं। विभक्ति सदा अंत में रहती है और कुछ विशेष पुर:प्रत्ययों को छोड़कर सभी साधक प्रत्यय धातु और विभक्ति के बीच में आते हैं 1 (१) संस्कृत में उपसर्ग प्रादयाः कहे जाते हैं और उनकी सूची यह है-प्र, परा, अप, सम्, अनु, अब, निस, वि, अाङ, नि, अधि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप । (२) इन सभी पुरः-प्रत्यय का अर्थ सहित वर्णन हिटने ने अपने व्याक- रण में किया है-देखो -- Whitncy's S. Graminar $ 1077 and 78. () Primary Suffises. () Secondary Suffixes. निर , दुस, दुर.
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