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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/१०२

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66 मनोविनोद हाय " गुरु " साहब, ठाकुर जी मानन वारे कहां गये तजि हमें हमारे परम पियारे पिंशन पाय बुढ़ापे में नेकहु नहिं भोगी तजि दीनी संसार तजै जैसे कोउ जोगी ( उन्के गुण ) अंगरेजी अरु फरासील भाषा को पण्डित संस्कृत हिन्दी रसिक विविध विद्या गुन मण्डित गुनियन को सर्वस्व, दीप निज सेत दीप कौ परम भक्त सेवक सुजान अपने महीप कौ विद्या बुद्धि विवेक विनय वाचा चतुराई इन सब सों संजुक्त, न्याय अरु सत्य मिताई ( उनके दो एक प्रसिद्ध कार्य ) पश्चिम उत्तर देश माहि करि नृप सिवकाई राखी प्रजा प्रसन्न सुकीरति बहु विधि पाई मथुरा नगरी तथा फर्रुखाबाद मझारी कीन्ही बहु उपकार थान जीरन उद्धारी ब्रज मंडल कौ ग्रन्थ माहि बहु वर्नन कीनो विविध भांति सों गूढ़ विषय दर्सित करि दीनी निज बानी में कीन्हीं तुलसी कृत रामायन जासु अमी रस पियत आज अंगरेजी बुध गन ( उपसंहार ) ऐसौ गुनी गुरूस आज सुर धाम सिधाय सुजस एक रहि गयौ सेस छिति माहिं समायो ८७ CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri