९४ मनोविनोद निहचें या संसार में दुर्लभ सांची नेह नेह जहां सांचौ तहां कहां प्रान कहां देह बिरलेन हीं को है सुलभ सांचौ सरल सनेह जहां निपट स्वारथ बसै तहां न ताको गेह प्रीति रीति जाने विना, भूलि न कीजे प्रीति बिन जाने कारज करे परै बहुत विपरीति प्रीति निवाही जिन प्रिये ! जीति लियो संसार या "असार" संसार में एक प्रीति ही सार प्रीति प्रथा अति पावनी, जानत नहिं सब कोय पहचानत पूरन प्रिये ! हरिजन प्रेमी दोय लीन होत प्रेमी रसिक निज प्यारे के संग श्रीभगवत भक्तन सरिस दीपक लोय पतङ्ग प्रिये ! प्रेम मग जे चले भले रहे जग माहिं सुख सुहाग अनुराग की डगर दूसरी नाहिं निहचें या संसार में बड़भागी नर दोय हरिचरनन चित जिन दियो पियौ प्रेम मद होय प्रेम नेम साधन कठिन करचो कौन पै जाय उनहों सो कछु निभिसकै लेय जिन्हें अपनाय प्रेम पियाला जो पिये मतवाला हो जाय कदै कसाला जीय का नेह निवाला खाय प्रेम विहाला होय के सुधि बुधि सबै गंवाय जपै जो माला नामकी जग जाला जरिजाय प्रेम पियाला जिन पिया जिया बुही जग माहि हुआ निहाला सब तरह, पूरे भाग सराहि CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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