मनोविनोद ७ मृनाल डहै हो। ते दिन बीतिगए, अलि को कलियान सों प्रेम अलाप रहे हो ! पंकज वृन्द विसें परभात, सुहाती सौ बात वह मद सान्यौ । देख्यौ तहां नव उत्पल के ढिंग, मातौ सौ भौंरा रह्यो मड़रान्यौ ॥ जाय मृनालिनि पै जबहीं अलि व्यारि सों तासी रहे बिलगान्यो । राति कमोदिनि संग रम्यौ तिहि कोपि मनी नलिनी अपमान्यौ ! ए आले स्यामता तो में घनी, छबि सों कटि पै पट पीत विराजै । बाल लता बनवारी नई, तिनके ढिंग तू छिन पै छिन भाजै ॥ प्यारी सी गुंज सों कुंजन में, बन- वारी की बांसुरी की धुनि लाजै । स्याम भये ब्रज वा- रिन कौ, द्रुम नारिन मांहि तू स्याम सौ राजै ! कटु केतिक काठ कठोर महा, तिन काटि अनेकन छेद करें । अवनी तल खोदत रंध्र कितेक, सुभावहि सों जदि काम परै ॥ नर को कर पर्स भऐं निज अंग, भुजंग की भांति डसै, न डरे । सोइ भृंग मृनालिनि अं- क फस्यौ, तजि सर्वस रखता सों मरै ! मालति मन्द सुगन्ध भई, मकरन्द पराग कौ लेस न पाइये । त्यों नव पौधा गुलाबन के, तिन में सब कांटे ही कांटे लखाइयै ॥ बेला जुही की मुही भइ बन्द, गय- न्द के गात न दान दिखाइये । ओखौ समै अब आय परची अलि ये दिन धीरजता सों बिताइये ॥ CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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