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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/२२

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मनोविनोद श्रीहरिश्चन्द्राष्टक १ ११ जय जय श्री हरि चन्द जयति भारत के प्यारे । जय जय भारत इन्दु जयति कविकुल उजियारे ॥ जय जय रसिक सुजान, सरस रसना रस नागर । जयजय बुद्धि विसाल, जयति कालिका उजागर ॥ जय अग्रवाल कुल कमल रवि, कविगन कुमुद निसाधि पति । जय श्री युत गिरिधर दास सुत, बुध समाज नुत विमल मति ! जय परहितपरबीन दीन दुखियन उपकारक । जय जय, आरज कुल गुन गन गौरव विस्तारक ॥ जय जय, भारत मध्य प्रेम अंकुर उपजायी । सुगम रीति सों प्रीति नीति मारग दरसायौ ॥ जिय सों हूं प्रिय निज देस हित, किय अनेक उन्नति जतन । तन मन धन सरवस बारि जिन्ह, त्यों समाज सोधन सतन ! जय जय हरि पद कञ्ज मज्ञ्जु मधुकर मतवारे । धर्म कर्म की धवल धुजा के रोएन हारे ॥ जय जय, ब्रज बल्लभ बल्लभ बल्लभकुल बल्लभ । जय जाचक बलि कल्प, कल्प- पादप कलि दुर्लभ || जय प्रेम नेम मूरति विसद, सद सद्वस्तु विवेक रत । जय जयति स्वदेस सनेह धन, गुन निधान गुनिगन प्रनत ! १ सन् १८८८ ई० में इस अष्टक की १००० प्रति निज व्यय से मु- द्रित करा के पं० श्रीधर पाठक ने बिना मूल्य वितरित की थी-- CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri