१६ मनोविनोद द्वैपद, चौपद, बहुपद, खेचर, कुचर, मनूख दवे अकाल काल रद, सहि रहे दारुन भूख डोलत कोटिन प्रानी, इत उत ले कर प्रान भए प्रानन के दानी, तुअ तन आनन आन ! हे घन ! अबहु न चितवहु, इत वहु विपति निहारि तुम सुख दिन कित बितवहु, हम कहं दुख महं डारि ? हे वारिद, नव जल घर ! हे धाराधर नास हे पयोद पय सुन्दर, हे अतिसय अभिराम हे पुष्कल वारांनिधि, हे जीमूत अपार हे सुख सम्पादन विधि, हे सुखमा सुखसार हे प्रानद आनंद घन, हे जग जीवन सार हे सजीव जीवन धन, हे त्रिभुवन आधार हे घन स्याम परम प्रिय, हे आनंद घन स्याम मुदित करन हरिजन हिय, हे हरि तनुज मुदाम हे जग जीय जुड़ावन, भीय छुड़ावन हार हे बकतीय उड़ावन, हीय बढ़ावन हार हे रन बँक धनुस धर, सर तरकस जल धार ग्रीसम विसम कलुस हर, रवि कर प्रखर प्रहार हे सनेह सुख दायक, हे अगनित गुन खान हे सौदामिनि नायक, हे हरितन उपमान हे सर सरित प्रचारक, हे जलवाह अबाध हे बहु व्याधि निवारक, हे सुख सिन्धु अगाध CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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