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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/३०

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मनोविनोद हे गिरि तुंग सिखर चर, हे निर्भय नभयान हे नित नूतन तन धर, हे पवमान विमान हे भूतल हित कारन, पावन परम पुनीत दुख दारिद अघ वारन, है मघवा मन मीत हे युव जन मन मोहन, सोहन, सरस रसाल रसिक रमन, रस दोहन, सुख पोहन, गुनमाल हे कृश कृषिक कृपाकर, हे ऋषि कृत गुन गान सुधा समुद वसुधा कर, हे महिमानमहान तुअ गुन गन गरुआई, हे घन अतिहि अमान अन गिन गुनियन गाई, रसना सकल सिरान तुम भारत के धन, जन, गुन गौरव आधार तुम ही तन, तुम ही मन, तुम प्रानन पतवार १७ सहि न सकहि सो तुम सन, तनकहु विसम वियोग तुम बिन व्यथित विकल मन, अनु हूं नहिं सुख जोग परम पुरातन तुम्हरौ, भारत सँग सत प्रेम जिहि जानत जग सगरौ, मानत निहिचल नेम सो तुम को नहि चहियत, छांड़न हित सम्बन्ध अटल सदैवहि कहियत, पूरन प्रकृति प्रवन्ध तिन अनादि नैमन कौं, जिन बिसरावहु भाय खोलहु निज नैनन कौं, बोलहु हित चित लाय उचित न एकहु छिनकौ, अब अवलम्बन मौन इन भारत वासिन कौ, तुम सन अन बन होन सोचहुं सुमिरि सुजस निज, हे उज्जल जस भौन इन दुखियनहि तुमहिं तज, घन ! अवलम्बन कौन CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri