102.2 f २६ र ४१.६२० मनोविनोद २१ जगत सचाई सार कहो न प्यारे मुझ से ऐसा - "झूठा है यह सब संसार "थोथा झगड़ा, जी का रगड़ा, केवल दुखका हेतु अपार" माना हमने वस्तु जगत की नाशवान हैं निस्सन्देह फिर भी तो छोड़ा नहिं जाता, पलभर को भी उनसे नेह लगा हुआ है वस्तु मात्र का एक दूसरे से सम्बन्ध दूषित क्योंकर हो सक्ता है उस कर्त्ताका अटल प्रबन्ध ? जगत है सच्चा, तनक न कच्चा, समझो बच्चा इस्का भेद पीओ खाओ, सब सुख पाओ, कभी न लाओ मनमें खेद "मिट्टी उदौना, मिट्टी बिछौना" मिट्टी दाना पानी है मिट्टी ही तन बदन हमारा, सो सब ठीक कहानी है पर जो उलटा समझ के इस्को, बने आपही ज्ञानी है मिट्टी करता है जीवन को, और बड़ा अज्ञानी है मिट्टी क्या है सोचो तो टुक अकूल लड़ाके प्यारे मित्र पञ्च महा भूतों में धसके, देखो इसकी बात विचित्र परम पवित्र पावनी पृथ्वी, भरी सकल सुधराई से पद पद पर शोभा से छाई, ईश्वर की चतुराई से अति अमोल रत्नों की जननी, सब द्रव्यों की माता है सदा सुधारस भरी, खरी, यह सब प्रकार सुख दाता है सब जीवों की भौतिक काया इस्से पोषण पाती है जीव से नाता छुट जाने पर इसी में वह मिल जाती है तुमसे, पृथ्वी से, मिट्टी से, है बस इतना ही सम्बन्ध काम तुम्हारे आती है वह, सुन्दर यह प्राकृतिक निबन्ध CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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