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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/३५

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२२ मनोविनोद समझ के सारे जगत को मिट्टी, मिट्टी जो कि रमाता है मिट्टी करके सर्वस अपना, मिट्टी में मिल जाता है कभी नहीं ऐसा सूरख नर सार सृष्टि का पाता है जैसा ही आया था जगमें वैसाही वह जाता है इस शरीर से जो मनुष्य नहिं कुछ भी लाभ उठाता उस्से तो वह पशू भला जो काम सैकड़ों आता है उस्का जन्म व्यर्थ है जो नर पौरुष कुछ न दिखाता है न इसलोक, ना उसी लोक में हाथ उसे कुछ आता है ऐसा कायर तो पृथ्वी को वृथा भार पहुंचाता है अपना जीना ही जिस्को एक बड़ा बोझ हो जाता जो तन मन से करता है श्रम, उचित रीति से चलता है सारी वसुधा का क्रम क्रम से, सर्वस उस्को मिलता है हाथ, पैर और नाक, कान, बुद्धि से काम जो लेता है जीवन का सुख पाता है वह, औरोंको सुख देता है पुत्र, कलत्र, मित्र, बान्धव में फैला कर सच्चा आनन्द काम जगत का करता है वह, रहता है सुख से स्वच्छन्द दुख कब ऐसे पुरुष सिंह के पास फटकने पाता है वह तो आलस का साथी है, आलसियों पर जाता है जब तक तुम इस जगमें सच्ची धर्म रीति पर चलते हो तब तक निस्सन्देह निरन्तर सब बातों में फलते हो सारा सांसारिक सुख पाकर ईश्वर को पहिचानौ हो उस्की विद्यमानता, सत्ता, वस्तु मात्र में जानी हो रचा उसी का है जब यह जग निश्चय उस्को प्यारा है इसमें दोष लगाना अपने लिये दोष का द्वारा है CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri